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(नोट - ये कहानी सच्ची घटना पै आधारित है, इस कहानी को लिखने से मेरा मतलब बचपन के उस दौर को याद करने की है, कृपा इससे मनोरजन का हिस्सा समझ सकते है, अन्यथा न ले !)

महाराज भोते पेली बात छि, सन १९९६-९७ ! स्कूल में पढ़छि वू टेम बे, स्कूल में जब हापटेम (दिन का लंच टाइम) हुन्छी तो हम सब दगडी एक लकड़क तखतक टुकड़ में रस्सी बाड़ी रुन्छी, उमे बैठ बे एक झणी खचनी भई, महराज एक
 दिन जब मी वू लाकड़क गाडी (तखतक तुकुड) में बैठी रो छि म्यार दगडी मोहित खचन ला रो छि, अचानक में म्यार हाथ पै रस्सी छुट पड़े और में भयो पढ़ बढीं, महाराज म्यार पैंट पिछाड बे फाट बड़ो, २ छेद है पड़ी ठुल ठुल, महाराज पूरा दिन स्कूल में धो रुन हए पड़ो, चेलियाक तो हसन-हसन रंगत आई भई , मिल हैट मास्टर सेपू को मासाब मेके छुट्टी दी दिओ म्यार पैंट पिछाड पै फाट गो, उनुल को दिखादे तू झूट बुलान्छे की सच्ची कुनेछे, अब महाराज शर्म तो लागनी भई कसी दिखुछी, उने दगड बगल में मास्तराणी ज्यू ले बैठी भई, हैट मास्टर सेपूल डांट लगे जल्दी दिखाओ , मिल दिखाई , महराज वू ले हसन भ्ग्याय मेरु पैंट में द्वी छेद बे ! मास्पूल डांट ले लगाईं और घरे ले भेज दे, थोडा वू टेम बे सिद-साद भोई ये वील, घर जेबे मिल हापू आम के को आमा देख यो इमे टाल डाल दे धे नातर बोज्यू मारल, महराज आमल उमे हापुड़ लाल धोतिक द्वी तुकुड निकल बे टाल डाल दे, में थोडा खुश हए गोई,
महराज असली शामत तो दुसर दिन आई जब रात्ती परे स्कूल हें तयार हूँ लगी भोई, बोज्यू बैठी भाय सामनी, अब म्यार भैर निकलन मुश्किल हए गोई, इदु में बोज्युल द्याल लगाईं, "अरे मुन्ना या धे" में दोडी लगे बे गोई, उनुल काम बताई, फिर में उल्ट कने जान भोगी, बोज्युल को उल्ट कने किले जाने छे मिल को इसीके मनं करनो, बोज्युल एक डांट लगे को सिद्द कने जा, मी जससे पलटो उनर नजर पड़ी गेई मेरी पैंट में, महराज वीक बाद तो सिसून अलग लागा उनुल, फिर स्कूल गोई, बाटफिना जो ले मिलों हसनी भोई मजाक बनुनी भई , स्कूल में ले सब लोग मजाक बनुनी भाय !
द्वी दिन बाद बोज्युल पजे नयी पैंट सिलाई बड़े मुश्किलाल ! तब जबे जान बच महाराज ! वी बाद आज तले कभी वू गाडी (लाकड़क तखत में ) में नी बैठ


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