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चित्रकार को सबसे पहले धन्यवाद की लोक वाध्य यंत्रों को इतना सम्मान दिया.... नहीं तो हालात तो ये है जहाँ से लोक जन्म लेता है अर्थात पहाड़ में वहां इनकी बड़ी दुर्दशा हुयी पड़ी है ...दो गावों का मैं यहाँ उल्लेख कर रहा हूँ
एक गाँव में होली जैसे त्यौहार में मैं गया था जहाँ एक पधान जी के गोठ में मसक्बीन और तुरी इसे फेंकी थी पता नहीं कब से उसका इस्तेमाल ही नहीं हुआ पता किया तो करीब ७-८ साल से कोई भी बा

ध्य यंत्र गाँव वालों ने बाहर ही नहीं निकले है क्योंकि उस गाँव के ६५ परिवार रहते थे जो आज संख्या घटकर मात्र १४ परिवारों की रह गयी है
दूसरा गाँव जहाँ के बुजुर्ग ने बहुत सारे तुरी बनायीं थी ताम्र कला से जुड़े थे वो जिन्होंने बताया मार्केट के आभाव में सारा काम जस का तस पड़ा हुआ है अब तो हौसला ही टूट गया इस तरफ ध्यान ही नहीं देते ना अब ताम्बे का काम ही इतना रह गया है सब ब्यवहारिक रूप से प्लास्टिक आ गया है इस लिए हमारी रोजी नहीं चल पाती है अब ये काम छोड़ दिया है .........आज जरुरत है इनको संजोने की


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