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रैथल : उत्तराखंड का एक गाँव जो दे रहा शहरों को मात…….

जब उत्तराखंड के ज्यादातर गांव देश के अन्य गांवों की तरह पिछड़ेपन, कुरीतियों, अभावों और इस सबके चलते पलायन से दो-चार हैं तब उत्तरकाशी जिले में एक गांव ऐसा है जो शहरों को मात देने के साथ गांधी जी के स्वावलंबी गांव अर्थात ग्राम स्वराज के सपने में रंग भर रहा है । इसके आधार स्तम्भ रहे थे एक शिक्षक कामरेड स्व. चन्दन सिंह राणा । 6,000 फुट से अधिक ऊ
ंचाई पर बसे उत्तराखंड के एक दूरदराज के गांव रैथल में वे सब सुविधाएँ एक साथ मौजूद हैं और वह भी उपयोग करने लायक सही-सलामत हालत में, उत्तरकाशी जिला मुख्यालय से गंगोत्री की ओर 45 किलोमीटर की दूरी पर बसे रैथल गांव में लगभग 200 परिवार रहते हैं और इस गांव की कुल आबादी 1,200 से अधिक है । रैथल उत्तराखंड का एक ऐसा गांव है जहां से हाल के वर्षों में कोई पलायन नहीं हुआ, उल्टे बाहर से लोग आकर वहां बस रहे हैं ।

उत्तरकाशी जिले के दुरूह इलाके में स्थित रैथल आदर्श ग्राम का अनुपम उदाहरण पेश कर रहा है । इस गांव में बिछी सीवर लाइन, चमचमाती गलियां और जगमगाती स्ट्रीट लाइट देख लगता ही नहीं कि आप उत्तराखंड के किसी गांव में हैं ।

गांव के बीचोंबीच लाखों की लागत से बना शानदार कम्युनिटी हाल और अत्याधुनिक सार्वजनिक शौचालय रैथल की समृद्धि की कहानी बयान करता है। इतना ही नहीं, गांव में गढ़वाल मंडल विकास निगम का गेस्ट हाउस है तो हेलीपैड और स्टेडियम का निर्माण प्रक्रिया में है।

मुख्यमार्ग से ही गांव में प्रवेश के लिए कई रास्ते हैं। गांव में जिस गली से भी प्रवेश करो वह सीसी या फिर टाइल्स से बनी है। साफ सुथरी गलियों से यहां के लोगों में सफाई को लेकर जागरूकता का अंदाज लगाया जा सकता है। गांव में बिजली की दो लाइनें हैं। एक विद्युत विभाग की तो दूसरी पर्यटन विभाग की स्ट्रीट लाइट वाली । पहाड़ के हर गांव की तरह रैथल भी सीढ़ीनुमा है। गांव के बीचोंबीच चार सौ नब्बे साल पुराना लकड़ी का बना एक पांच मंजिला मकान आज भी सुरक्षित खड़ा है । सेब, आलू, राजमा और गेहूं यहां की मुख्य फसल है।

गांव की ये तस्वीर इसलिए नहीं बनी कि यहां किसी बड़े नौकरशाह का निवास है या किसी नेता का पैतृक निवास ? यह भी नहीं कि इस गांव को किसी बड़े उद्योगपति ने गोद ले लिया हो ? गांव की इस खूबसूरत तस्वीर को बनाने में खुद गांव वालों ने कूची और कैनवास उठाया और ग्राम स्वराज के शिल्पी स्व. चंदन सिंह राणा की देख रेख में एक ऐसी तस्वीर बना डाली कि यह गांव आज देश में ग्राम स्वराज की एक मिसाल बन गया है ।

स्व. राणा जी ने शिक्षा को विकास का आधार मानकर उस पर भी बहुत जोर दिया गया था । इस गांव में शिक्षा की स्थिति बेहतर है । एक प्राइमरी स्कूल ही है, हालांकि सरकार ने यहां हाईस्कूल खोलने का निर्णय लिया था लेकिन तब स्व. चंदन सिंह राणा जी ने इसका विरोध था । उनका मानना था कि दस किलोमीटर दूर भटवाड़ी में इंटर कॉलेज है लेकिन वहां सोलह साल से गणित के तथा बारह साल से विज्ञान के शिक्षक नहीं हैं । इसलिए भटवाड़ी इंटर कॉलेज को मजबूत किया जाए । वहां शिक्षक नियुक्त किए जाएं तथा लैब बनाया जाए । आस-पास के गांवों के बच्चों को स्कूल तक लाने-ले जाने के लिए बस की व्यवस्था की जाए तो एक ही खर्च में सभी बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सकेगी अन्यथा यहां भी अन्य स्कूलों की तरह सिर्फ स्कूल भवन नजर आएंगे । चंदन सिंह राणा इस पूरे मामले पर कहते थे कि हमें पूरे गांव का सहयोग मिला जिस कारण यहां की तस्वीर बदल पाई । नहीं तो यह कार्यबहुत ही कठिन था ।

इस गांव में हो रहे इस चमत्कार की कहानी आज के जमाने में अविश्वसनीय-सी लगती है, लेकिन इसका मूलमंत्र है विकास के लिए आए धन का शत-प्रतिशत सदुपयोग और इसमें बरती जाने वाली पारदर्शिता. । चंदन सिंह पेशे से एक अध्यापक थे । वर्ष १९७० में इन्होंने नौकरी छोड़ दी और रैथल ग्राम सभा के प्रधान चुने गए । बस इसके बाद इन्होंने ग्रामीणों का विश्वास जीता और सरकारी योजनाओं का शत-प्रतिशत लाभ उठाया । जनता के साथ मिलकर प्रधान ने न तो अफसरों की जी-हूजूरी की और न ही ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा दिया । सारा काम गांव के लोगों से कराया । जिसका नतीजा यह हुआ कि ग्रामीणों तक वो सारी सुविधाएं पहुंची जिनमें उनका संवैधानिक हक था । तेजी से विकसित होता यह गांव सुविधाओं के मामले में ही नहीं, उत्तराखण्ड की सबसे बडी समस्या पलायन रोकने के लिए भी मॉडल माना जा सकता है । यह गांव उत्तराखण्ड का एकलौता गांव है जहां पिछले कई वर्षों से कोई पलायन नहीं हुआ है । चंद नौकरी-पेशा वाले ही हैं जिन्हें अन्यत्र पोस्टिंग के कारण बाहर जाना पड.ता है । गांव की यह तस्वीर दूसरों को अपनी ओर खींचती भी है। कई दूसरे गांव से लोग यहां बसने के लिए आये और सपनों के इस गांव में अपना आशियाना बनाए । गांव के किसान नकदी फसलों की खेती करते हैं। गांव में कुल ग्यारह गेहूं के थ्रेसर हैं । इससे यहां की खेती का पता चलता है ।

यह काम लीक से हटकर था इसलिए उन्हें दिक्कतें भी कम नहीं आईं. अधिकारियों-अभियंताओं के कमीशन और ठेकेदारों की अंधेरगर्दी से निपटना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने सारे गांव को साथ लेकर एलान कर दिया कि इस गांव में यह सब बिलकुल नहीं चलेगा । कोई योजना गांव में आती तो पूरे गांव को उसकी जानकारी दी जाती, सबका हानि-लाभ देखकर उसका क्रियान्वयन होता और ठेकेदारों के एक-एक काम पर गांववालों की निगरानी रहती । कई बार नियमानुसार न हुए काम या घटिया निर्माण को तोड़ा भी गया. धीरे-धीरे एक नजीर-सी बनती चली गई ।

लगातार 18 वर्ष तक प्रधान रहने के बाद राणा जी ब्लॉक प्रमुख बने थे, अभी हाल ही में इस कर्मयोगी का देहांत भी हो गया, मगर गांव में उनकी स्थापित की हुई परंपरा आज तक जीवित है । विश्व प्रसिद्व दयारा बुग्याल का आधार गांव होने के कारण इस गांव को पर्यटन योजनाओं के लिए भी पैसा मिला है और आज तक गांव में विकास कार्यों के लिए लगभग पांच करोड़ से अधिक की राशि यहां खर्च की जा चुकी है, यह सारा पैसा वास्तविक रूप से योजनाओं के काम में खर्च हुआ है । इनसे स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिला और आज वे इनका उपयोग भी कर रहे हैं. उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय तो अब इस गांव के विकास को आधार बनाकर ग्राम्य विकास का एक पाठ्यक्रम भी शुरू करने जा रहा है ।

यहां इस गांव का जिक्र इसलिए कि स्व. चंदन सिंह राणा और उनके रैथल गांव का उदाहरण सितंबर में आपदा की बारिश से तबाह हुए उत्तराखंड के लिए आज एक मॉडल बन सकता है । वर्तमान प्रधान मनोज राणा ने कहा कि यहां पूर्व में ही विकास की लीक बना दी गई थी जिस पर चलकर इस गांव का विकास संभव हो पाया । हम उसी लीक पर आगे बढ़ रहे हैं ।


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