.

.

uttarakhandnews1.blogspot.in






गांव को स्वस्थ्य-सुंदर बनाने में जुटे दो शहरी बुजुर्ग 


छोड़ी शहर की शानो-शौकत....


मनोहर सिंह चौहान पहाड़ में तेजी से खेती छोड़ते काश्तकारों के सामने पांरपरिक खेती से हटकर नए विकल्प तलाशने की मिशाल पेश करने में जुटे हैं और हरि सिंह उनको स्वस्थ्य करने के अभियान में. बुजुर्गों ने घर वालों की नाराजगी झेलते हुए अपनी माटी में मेहनत करना ज्यादा जरूरी समझा है...


यहां तंगहाली नहीं जिंदादिली है. जिंदगी की बेतरतीब सलवटों के बीच एक बूढ़ा माली फिजा में मेहनत और अपनी माटी की खुशबू फैला रहा है तो दूसरा गमगीन चेहरों और बोझिल जिंदगी से उदास चेहरों पर ख़ुशी के रंग बिखेर रहा है. दोनों की कहानी एक दूसरे से बहुत ज्यादा जुदा नहीं है, अलबत्ता उम्र में जरूर थोड़ा सा फर्क है. उम्मीद के अंकुर सहेजते ये दो बूढ़े जिंदगी के अनुभवों से जिंदगी में लोगों को रोशनी ला रहे हैं.


हरि सिंह चौहान और मनोहर सिंह चौहान दो ऐसी शख्सियतें हैं, जिनके लिए उम्र के पैबंद बहुत ज्यादा मायने नहीं रखते. दोनों ही जिंदगी के सत्तर दशक पार कर चुके हैं, लेकिन उत्साह ऐसा कि 20 बरस का नौजवान भी एक पल के लिए ठिठक जाए. एक खेती के लिए समर्पित है तो दूसरा लोगों की बीमारी हरने में प्रयासरत. 


उत्तराखंड के पौड़ी मण्डल मुख्यालय से करीब 25 किमी दूर सबदरखाल कस्बे में दोनों ही अपनी जिंदगी के बचे हुए पलों को आजादी से जीने के लिए आए हैं. दोनों का पैतृक गांव भी एक ही है- बकरोड़ा. घर में सब संपन्न हैं, खुद अच्छी खासी सरकारी सेवा से रिटायर्ड हुए हैं, दिल्ली में घर है, विदेश में बेटे का रेस्त्रां है, लेकिन इन बुजूर्गों को शहरी संभ्रातता से ज्यादा मोह अपनी माटी का है. 


सरकारी सेवा से रिटायर्ड हुए मनोहर सिंह चौहान पहाड़ में तेजी से खेती छोड़ते काश्तकारों के सामने पांरपरिक खेती से हटकर नए विकल्प तलाशने की मिशाल पेश करने में जुटे हैं. 73 वर्षीय मनोहर ने भरा पूरा परिवार होने के बावजूद घरवालों की नाराजगी झेलते हुए अपनी माटी में मेहनत करना ज्यादा जरूरी समझा है. जिंदगी भर कर्मचारी राज्य बीमा निगम दिल्ली में नौकरी करने के बाद मनोहर आज अकेले अपने गांव बकरोड़ा में रहकर औरों के लिए मिशाल पेश कर रहे हैं. 


वर्ष 2000 में सेवानिवृत्त होने के कुछ समय बाद वे दिल्ली से अपने गांव पंहुचे, जहां दूर तलक फैली बंजर भूमि ने उन्हें अंदर तक झकझोर कर रख दिया. उन्होंने बाकियों के लिए बेकार हो चुकी इसी भूमि को चुन इस पर फूलों की खेती करना शुरू कर दिया. वर्ष 2008 से तकरीबन 15 नाली भूमि पर चैहान गेंदा व ग्लैडुलाई के फूल उगा औसतन बीस हजार रूपया प्रतिमाह कमा रहे हैं. उनके फूलों का कारोबार पहाड़ ही नहीं बल्कि दून की घाटियों तक फैला हुआ है. 


मनोहर अपनी मेहनत से बकरोड़ा को मिनी फूलों की घाटी में तब्दील करने का सपना देखते हैं, लेकिन उनका सपना उस वक्त टूट जाता है जब उन्हें अपनी मेहनत से कहीं आगे सरकारी उदासीनता और भ्रष्ट नौकरशाही की लूट खसोट नजर आती है. मनोहर पिछले चार सालों में बकरोड़ा घाटी में तीन हजार से ज्यादा वृक्ष लगा चुके हैं अलबत्ता इनमें से ज्यादातर पौध सुरक्षा के अभाव में खत्म हो गई. 


बकौल मनोहर, ‘मैं पिछले चार वर्षों से वन विभाग से महज तीन सौ ट्री गार्ड मांग रहा हूं, लेकिन सिवाय कोरे आश्वासनों के कुछ नहीं मिल पा रहा है.' हाल ही में मनोहर ने बीस हजार पौध ग्लैडुलाई की लगाई है, जो दो माह में बाजार में उतरने को तैयार हो जाएगी. मनोहर के एक बेटे की दिल्ली में निजी कंपनी है और दूसरे का न्यूजीलैंड में खुद का रेस्त्रां. मनोहर के बेटे पिछले कई सालों से अपने पास बुला रहे हैं, लेकिन वह अपने खेतों को छोड़ जाने को तैयार नहीं हैं.


शहरी आराम छोड़ गांवों को तंदुरूस्त करने का बीड़ा उठाया है मनोहर के साथी हरि सिंह चैहान ने. गृह मंत्रालय, खाद्य मंत्रालय, श्रम मंत्रालय और यूपीएससी में सेवाएं देने के बाद हरि सिंह ने दिल्ली के आलीशान बंगलों के बजाय पहाड़ के छोटे से लेकिन खूबसूरत घर में रहकर लोगों की मदद करने को प्राथमिकता दी. बीमारियों से मायूस जिंदगियों में खुशगवार रंग भरने में जुटे हरि सिंह का उत्साह जिंदगी के 77 वें पड़ाव में भी देखते ही बनता है. 


हरि सिंह बताते हैं, ‘सरकारी सेवा के दौरान ही मैंने दिल्ली में मैग्नेट थैरेपी का प्रशिक्षण लिया. 1994 में सेवानिवृत्त के बाद मैंने दिल्ली में ही रचार साल मैग्नेट थैरेपी की, लेकिन 1998 में अपने पैतृक गांव बकरोड़ा लौट आया. दिल्ली छोड़ने की मुश्किलों की चर्चा करते हुए हरि सिंह ने बताया कि, ‘घरवालों से दूर रहने का फैसला लेना थोड़ा मुश्किल था, लेकिन जब आंखों के समाने बीमार मायूस लोग दिखाई पड़ते तो जेहन में एक अजीब सी सिहरन दौड़ पडती. यही वो पल होता जब मैं उद्वेलित हो उठता और पहाड़ में लौटना चाहता.'


बिना दवा की यह चिकित्सा पद्धति जितनी कारगर है उतने ही हरि सिंह के उसूल. हरि सिंह फीस के एवज में आज भी अपने मरीजों से दस रूपये वसूलते हैं. वह कहते हैं कि रूपये लेकर वह क्या कर लेंगे वह तो जिंदगी के बचे हुए पल आजादी और स्वाभिमान से जीना चाहते हैं. 


गरीब पहाडि़यों के अपने डॉक्टर हरि सिंह मरीजों का प्रसंग सुनाते हुए पहाड़ की चिकित्सा व्यवस्था पर चिंतित हो उठते हैं. वह हाल ही में किये एक सफल ईलाज का संदर्भ बताते हैं कि कैसे एक महिला जिसके हाथ बेजान हो चुके थे, अब वह तंदुरुस्त है. वे कहते हैं, ‘बगल के गांव की प्रेमा, पूरा नाम भूल रहा हूं. उसका दांया हाथ पक्षाघात के चलते खराब हो गया था. उसे उम्मीद नहीं थी कि वह सही भी हो सकेगी, लेकिन पांच महीने की मेहनत और ईलाज से आज वह खुद अपने बाल बनाती है, उसका हाथ अब आसमान की ओर सीधे उठाते हैं.’ 


मनोहर सिंह चौहान और हरि सिंह चौहान दोनों ही हमारे समाज में उन बुजुर्गो के लिए एक उदाहरण हैं, जो तमाम सुविधाओं के बावजूद अकेलेपन के अंधेरे में रहने को मजबूर हैं. उनके लिए भी उदाहरण हैं, जिन्हें लगता है कि रिटायर्ड होने के बाद वह बेकार है, परिवार में बोझ हैं. 


मनोहर सिंहकहते हैं, ‘शहरी सुविधाओं को छोड़ गांवों की ओर लौटना एक बुजुर्ग के बेहद चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन अगर उसके कुछ सपने हों और जिना चाहता हो तो इन पहाड़ों में जीवन की जन्नत है. हमारा स्वर्ग तो यही है. 


See More

 
Top