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आत्मा के कारण ही पंचमहाभूतों अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी व आकाश की स्थिति है। उसके कारण ही उनका विकास होता है, ह्रास भी होता है। आत्मा सब कुछ है। इसे जानो, पहचानो।आश्चर्य की बात यह है कि मानव जिसके लिए कार्य कर रहा है, प्यार कर रहा है, बलिदान कर रहा है, कष्ट झेल रहा है वह आत्मा न दिखाई देती है, न सुनाई देती है पर सब उसकी सत्ता को मानते हैं इसलिए वह माननीय है। उसका ही चिंतन मनन करना चाहिए। उसे देखने, सुनने, समझने और जानने से सब गांठें खुल जाती हैं। 

मानव को इस संसार में सभी वस्तुएं मीठी व मधुर लगती हैं इसीलिए इसे मधु विद्या भी कहते हैं। ब्रह्म विद्या भी यही है। जैसे पृथ्वी, जल, विद्युत, बादल, आकाश, चंद्रमा, आदित्य, वायु, अग्नि, दिशाएं, धर्म, सत्य, अहंभाव आदि सबको मधु के समान प्रिय लगते हैं। भिन्न-भिन्न जीवों में, व्यक्तियों में, तेजोमय अमृतमय जो आत्मा है वही अमृत है


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