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पदयात्रा "गैरसैण" विर्तांत (3)

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गेस्ट हाउस में पहले से ही कई महारथी हाज़िर थे,ऊपर से नेगी दा के साथ हम तीन लोगों का जाना व दो पदयात्रीयों भाई समीर रतूडी तथा भाई दीप पाठक "युवा" के भयंकर आगमन से वहां का माहौल उत्सव जैसा बन गया. सभी नेगी दा के इर्द गिर्द घूम रहे थे. नेगी दा को सम्मुख देख समीर भाई की सांसें फूलनी कुछ हद तक कम हुईं , दीप दा के चेहरे पर भी रौनक आ गई .अब हालात सामान्य हो गये थे . खूब दुआ सलाम हुआ. सभी गले मिले. मैंने भी दीप दा को एक जोर की जादू की झप्पी दे डाली मन खुश हुआ .गेस्ट हाउस में दो तीन कमरे बुक थे . इधर-उधर नजर दौडाई तो किचन में कुछ और लोग दिखे. ,गैस के चूल्हे पर एक प्रेसर कूकर व पतीले से कुछ भाप निकल रही थी,साइड में एक परात में आटा गूंन्दा हुआ दिखा . कुल मिलाकर अन्दर का माहौल घर की रसोई जैसा था . हमारे जाने से पहले कुछ दौर-ए-जाम चल रहा था एक रसोइया भाई भी खूब टल्ली दिखा तो बाकियों की आंखें लालपरी जैसी .हममे से सिर्फ दो ने कुछ हल्का सा चियर्स किया. बाकी कभी नहीं लेते थे.नेगी दा को पता न लगे सो उनके सम्मान में एक कमरे में कुण्डी लगा इस काम को क्रमबद्ध अंजाम दिया जाना नियोजित था. जारी .....


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