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चन्द्र सिंह भण्डारी "गढ़वाली"

जन्म- 1891, निधन- 1 अक्टूबर, 1979
ग्राम- मासी, सैणीसेरा, चौथान पट्टी, गढ़वाल।
महात्मा गांधी के शब्दों में "मुझे एक चंद्र सिंह गढ़वाली और मिलता तो भारत कभी का स्वतंत्र हो गया होता।"

11 सितम्बर, 1914 को 2/39 गढ़वाल राईफल्स में सिपाही भर्ती हो गये,
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अगस्त 1914 में मित्र राष्ट्रों की ओर से अपने सैनिक साथियों के साथ योरोप और मध्य पूर्वी क्षेत्र में प्रत्यक्ष हिस्सेदारी की। 

अक्टूबर, 1914 और 1920 के बाद चन्द्र सिंह देश में घटित राजनैतिक 
घटनाओं में रुचि लेने लगे। 1921 में गांधी जी के बागेश्वर आगमन पर 
उनकी मुलाकात गांधी जी से हुई और गांधी जी के हाथ से टोपी लेकर, 
जीवन भर उसकी कीमत चुकाने का प्रण उन्होंने कर लिया।

1930 में इनकी बटालियन को पेशावर जाने का हुक्म हुआ, 23 अप्रैल, 1930
को पेशावर में किस्साखानी बाजार में खान अब्दुल गफ्फार खान के लालकुर्ती 
खुदाई खिदमतगारों की एक आम सभा हो रही थी। 
अंग्रेज आजादी के इन दीवानों को तितर-बितर करना चाहते थे, जो बल प्रयोग
से ही संभव था।
कैप्टेन रैकेट 72 गढ़वाली सिपाहियों को लेकर जलसे वाली जगह पहुंचे और 
निहत्थे पठानों पर गोली चलाने का हुक्म दिया। 
चन्द्र सिंह भण्डारी कैप्टेन रिकेट के बगल में खड़े थे, उन्होंने तुरन्त सीज फायर
का आदेश दिया और सैनिकों ने अपनी बन्दूकें नीचीं कर ली। चन्द्र सिंह ने कैप्टेन
रिकेट से कहा कि "हम निहत्थों पर गोली नहीं चलाते" इसके बाद गोरे सिपाहियों
से गोली चलवाई गई। 
चन्द्र सिंह और गढ़वाली सिपाहियों का यह मानवतावादी साहस अंग्रेजी हुकूमत की
खुली अवहेलना और राजद्रोह था। 
उनकी पूरी पल्टन एबटाबाद(पेशावर) में नजरबंद कर दी गई, उनपर राजद्रोह का 
अभियोग चलाया गया। हवलदार चन्द्र सिंह भण्डारी को मृत्यु दण्ड की जगह
आजीवन कारावास की सजा दी गई, 16 लोगों को लम्बी सजायें हुई, 39 लोगों को
कोर्ट मार्शल के द्वारा नौकरी से निकाल दिया गया। 7 लोगों को बर्खास्त कर दिया गया,
यह फैसला मिलिट्री कोर्ट दआरा 13 जून] 1930 को ऎबटाबाद छावनी में हुआ।
बैरिस्टर मुकुन्दीलाल ने गढ़वालियों की ओर से मुकदमे की पैरवी की थी।
चन्द्र सिंह गढ़्वाली तत्काल ऎबटाबाद जेल भेज दिये गये, 26 सितम्बर, 1941 को 
11 साल, 3 महीन और 17 दिन जेल में बिताने के बाद वे रिहा हुये।
ऎबटाबाद, डेरा इस्माइल खान, बरेली, नैनीताल, लखनऊ, अल्मोड़ा और देहरादून
की जेलों में वे बंद रहे और अनेक यातनायें झेली। नैनी सेन्ट्रल जेल में उनकी भेंट
क्रान्तिकरी राजबंदियों से हुई। लखनऊ जेल में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से भेंट हुई।


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