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एक गॉव था धौंतरी गाड़ (गदना)-
पौड़ी जनपद में मुख्यालय से मात्र ७-८ किलोमीटर दूरी पर पैडूलस्यूं पट्टी में गहड़, डोबल्या, भेमली और केबर्ष गॉव से अपनी सीमाएं बाँटता गॉव धौंतरी गाड़ किसी जमाने में पढ़े- लिखे संभ्रांत चंदोला जाति के ब्राह्मणों का गॉव माना जाता था जिनके पूर्वज कालान्तर में कफोलस्यूं पट्टी के थापली गॉव से आकर यहाँ बिस्थापित हुए थे. 
मेरा भी इस गॉव में दो एक बार जाना इसलिए हुआ कि एक तो इसकी सरहद भेमली गॉव से लगी है जहाँ मेरी माँ का मायका (मेरा ननिहाल) है और दूसरी बात यह कि यह डोbल्या गॉव से नजदीक पड़ता है जहाँ हमारा पुराना गॉव है, और हमारे पारिवारिक दो तीन परिवार आज भी इसी गॉव में बसे हुए हैं.
यूं तो कालान्तर में हम भी चौन्दकोट गढ़ी के नजदीक नौखंडी से इसोटी, इसोटी से कुलाणी से डोबल्या और दोबल्या से कफोल्स्युं धारकोट आ बसे हैं. हमारे पूर्वज पदान हुआ करते थे. लेकिन हम भी काल अंतराल के साथ साथ दशा और दिशा बदलते रहे.फिर भी हमारे सभी गॉव आज भी आवाद हैं.
धौंतरीगाड़ गॉव से मेरा लगाव और जुड़ाव इसलिए भी था क्योंकि ये थापली गॉव से आकर यहाँ बसे चंदोला लोग हैं. और थापली मेरी फूफू की ससुराल हुई.
इस बार एक शादी में हाल ही में भेमली गॉव गया जहाँ तक अब सड़क पहुँच गई है. मैन हुआ क्यों न धौंतरी गाड़ जाकर कुशल क्षेम भी पूछ आऊं और पुरानी यादें भी ताजा कर लूँ. लेकिन जब इस गॉव पहुंचा तो देखा बड़े बड़े भवनों की छत्तें टूट गयी हैं जहाँ साग सब्जी हुआ करती थी उन खेतों में कंडाली के आदमकद झाड़ियाँ उगी हैं. जिन पेड़ों के संतरों का रस आज भी मेरी दाड के कोने-कोने को रसीला बना रहा है वो सूखकर अपनी बर्बादी की दास्ताँ सूना रहे थे.
उफ़ इस असहनीय मंजर को देख मेरा दिल भर आया. पलकें गीली हुई जब देखा कि पूरा गॉव सन्नाटे में तब्दील है.कई चेहरों को ढूंढती आँखें और जवानी की वह अल्हड़ता याद आ गई. गॉव बंजर और खंडहर ......................!
हे इश्वर.. मेरे गॉव में ऐसी शिक्षा और संस्कृति मत लाना कि मेरा गॉव भी धौंतरी गाड़ जैसा गूंगा बहरा और अफाहिज हो जाय. जहाँ के नौनिहालों ने अपनी शिक्षा और विकास के ताने बाने बुनकर इस माटी में लतपत होकर इस श्रृष्टि के सुख भोगने के लिए अपने पुरानों द्वारा बनायी हवेली नुमा आवासों को छोडकर शहर में दमघोटू संस्कृति में चंद सुखों के लिए पलायन कर दिया.


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