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गैरसैंण राजधानी बना कर उत्तराखण्ड के परमार बने हरीश रावत
गैरसेंण(भराड़ीसेंण) में तम्बूओं के पण्डाल में होगा 9 जून से चार दिवसीय विधानसभा सत्र
उत्तराखण्ड सरकार ने गैरसैंण राजधानी बनाने की राज्य गठन जनांदोलन की मूल भावना व शहीदों की शहादत का सम्मान करने दिषा में महत्वपूर्ण कदम बढाते हुए गैरसैंण में 9 जून से 4 दिवसीय विधानसभा सत्र का आयोजन करने का निर्णय लिया। यह सत्र गैरसैंण स्थित भराड़ी सैण में बनाये जा रहे विधानसभा भवन स्थल पर टेण्ट लगा कर आयोजित किया जायेगा। हालांकि अभी भराड़ी सैंण में विधानसभा सत्र के आयोजन की मूलभूत सुविधायें नहीं है परन्तु सरकार के दृढ़ निश्चय के कारण सरकार इस सत्र का आयोजन भराड़ीसैंण में टेण्ट में भी करके साफ संदेश देना चाहती है।
राज्य गठन के 12 साल तक प्रदेश की कांग्रेस व भाजपा की तिवारी, खण्डूडी व निषंक सरकारों ने राज्य गठन की प्रमुख मांग राजधानी गैरसैंण की शर्मनाक उपेक्षा करके जनभावनाओं का जो घोर अपमान किया उससे न केवल राज्य गठन के आंदोलनकारी खुद को अपमानित महसूस कर रहे थे अपितु राज्य गठन के लिए मुलायम व राव के अमानवीय दमनों को सहने वाली जनता भी खुद को ठगी महसूस कर रही थी। प्रदेश के हुक्मरानों की लोकशाही को रौंदने की इस धृष्ठता को षहीदों की शहादत का अपमान मानते हुए गैरसैंण राजधानी बनाने की मांग करते हुए उत्तराखण्ड के महान सपूत बाबा मोहन उत्तराखण्डी ने तिवारी राज में आमरण अनशन करते करते अपनी शहादत दे दी। उनकी शहादत के बाबजूद उत्तराखण्ड की जनभावनाओं को रौंदने के सबसे बडे गुनाहगार प्रथम निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने इस मुद्दे की शर्मनाक उपेक्षा करते हुए गैरसैंण में राजधानी बनाने के बजाय देहरादून में ही राजधानी बलात थोपने का निरंतर शडयंत्र किया। इसके बाद प्रदेश की सत्ता में आसीन हुए भाजपा के भुवनचंद खण्डूडी व रमेश पोखरियाल निशंक भी सत्तामद में इतने धृतराष्ट्र बन गये थे कि उन्होंने भी तिवारी के उत्तराखण्ड विरोधी कृत्यों का अंध अनुशरण करके गैरसैंण मुद्दे पर शर्मनाक मौन रखा।
गैरसैंण राजधानी बनाने की दिषा में सबसे पहले सराहनीय पहल पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने तत्कालीन कांग्रेसी सांसद सतपाल महाराज की सलाह पर किया। हालांकि यह भी मंत्रीमण्डल की एक दिवसीय बैठक के नाम पर किया गया। इसके बाद गैरसैंण में ही विधानसभा भवन बनाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया। इसका शिलान्यास भी किया गया। हालांकि इसे अघोषित ग्रीष्म कालीन राजधानी बनाने की अघोशित मंशा के रूप में प्रचारित किया गया। पर सरकार की इस पहल पर प्रदेष के वर्तमान मुख्यमंत्री हरीश रावत के सबसे करीबी सिपाहेसलार, विधानसभा अध्यक्ष गोविन्दसिंह कुंजवाल, तत्कालीन सांसद प्रदीप टम्टा सहित अन्य प्रमुख नेताओं ने गैरसैंण में ग्रीष्म कालीन राजधानी बनाने के बजाय इसे पूर्ण राजधानी ही बनाने की न केवल मांग की अपितु इस मामले को लेकर विधानसभा अध्यक्ष गोविन्द सिंह कुंजवाल व सांसद प्रदीप टम्टा ने व्यापक बागनाथ से जागनाथ जनजागरण अभियान भी चलाया। इसी दौरान न जाने किस निहित स्वार्थियों की सलाह पर मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने गैरसैंण के साथ साथ देहरादून में भी विधानसभा भवन का षिलान्यास करवाने का ऐलान करके जनता की आशाओं पर बज्रपात करने का कार्य किया। परन्तु विधानसभा अध्यक्ष गोविन्द सिंह कुंजवाल, पूर्व सांसद प्रदीप टम्टा ही नहीं विधानसभा उपाध्यक्ष अनुसूया प्रसाद मैखुरी ने भी गैरसैंण मे ही राजधानी बनाने की मांग जारी रखी। गैरसैंण के भराड़ीसैंण में विधानसभा भवन का षिलान्यास हुए एक साल से अधिक समय हो चूका है परन्तु अभी तक इसका निर्माण कछुवे की चाल की तरह चल रहा है। बहुगुणा सरकार इसको युद्धस्तर पर निर्माण कराने का नैतिक साहस तक नहीं जुटा पायी।
इस मामले में मैने व अपने आंदोलनकारी संगठनों की तरफ से वर्तमान मुख्यमंत्री हरीश रावत, पूर्व सांसद प्रदीप टम्टा, पूर्व सांसद सतपाल महाराज, हरकसिंह रावत, यशपाल यार्य, बच्चीसिंह रावत, पूर्व मुख्यमंत्री तिवारी, खण्डूडी, निशंक, कोश्यारी व बहुगुणा से कई बार बात हुई । स्थिति सामने हैं। असंख्य बार इस मामले में प्रदर्षन, गोश्ठियां, ज्ञापन भी दिये जा चूके है। जब ये नेता विनम्रतापूर्वक की जा रही इस मांग को नजरांदाज करने लगे तो इसके कुशासन को उखाड़ फेंकने के लिए जनादेश व महाकाल के चाबूक से इनको दण्डित भी किया गया। परन्तु ये नेता अधिकांश दुर्योधन की तरह फिर भी समझ कर भी नासमझ बने हुए है। इससे प्रदेश को जो नुकसान हो रहा है उसका भान इनको कहीं दूर-दूर तक नहीं है।
अब बहुगुणा के बाद हरीश रावत के मुख्यमंत्री बनने पर लोगों को आश जगी की अब हरीश रावत की सरकार गैरसैंण को राजधानी बनाने का निर्णायक व ऐतिहासिक कार्य करेगी। लोकसभा चुनाव में मुंह की खाने के बाद सरकार द्वारा इस दिशा में 4 दिवसीय विधानसभा सत्र का आयोजन तम्बूओं में भी करने का निर्णय को भले ही विरोधी दल मीन मेख निकाले परन्तु यह इस दिशा में एक सार्थक प्रयास ही होगा। जिस प्रदेष के नेताओं, बुद्धिजीवियों, समाजसेवियों व आम जनता में जब प्रदेश के मूल हितों के प्रति उदासीनता हो तो वहां पर इस प्रकार के आधे अधूरे मन से उठाये गये राजनैतिक कदम भी किसी प्राणवायु से कम नहीं होते हैं।
हालांकि राज्य गठन आंदोलनकारियों की तरह जनता चाहती है कि सरकार अविलम्ब गैरसैंण राजधानी घोषित करें। परन्तु इस मामले में प्रदेश की प्रारम्भिक सरकारों ने इतना उलझा दिया है कि मुझे नहीं लगता वर्तमान किसी भी प्रदेश के नेता में इतनी इच्छा शक्ति है कि वह दलगत व निहित स्वार्थ से उपर उठ कर प्रदेश के दूरगामी व जनभावनाओं का सम्मान करते हुए दो टूक शब्दों में गैरसैंण राजधानी गठित करने का निर्णय ले। ऐसी स्थिति में भगवान बदरीनाथ व बाबा केदारनाथ प्रदेश के इन सरकारों से इस दिशा में ऐसे महत्वपूर्ण कदम भी उठाने की सदबुद्धि देते रहे तो गैरसैंण राजधानी बनाने की जनांकांक्षा अवश्य पूरी होगी। 


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