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उत्तराखंड सृजन के बाद यहाँ के जन मानस की हार्दिक अभिलाषा है कि कुमाऊनी और गढ़वाली बोली को उत्तराखंड की राजभाषा का दर्जा मिले! कुमाऊनी या गढ़वाली को राजभाषा बनाने हेतु हमैं कई बाधायैं पार करनी होंगी! पहली बात तो यह है कि हम कुछ भी कहें परन्तु कुमाऊनी-गढ़वाली एक भाषा नहीं बोली ही है! भाषा या बोली के बारे मैं कहा जाता है कि यह हर 8-10 किलोमीटर मैं बदल जाती है! जो लोग सड़क से दूर रहते हैं उनकी बोली कुछ अलग सी होती है, जबकी शहर मैं रहने वाले लोगों की बोली मैं हिन्दी का पुट ज्यादा होता है! ‘क्यों कर रहे हो’ इसे विभिन्न स्थानों मैं विभिन्न तरीके से बोला जाता है! जैसे- किहीन करनॉर छै? किहीन कर्मरी? ‘किही करनौर छी’? आदि आदि! पहाड़ी विभिन्न स्थानों मैं विभिन्न तरीके से तो बोली जाती है, परन्तु भावर्थ वही होता है! कुमाऊनी अत्यन्त भावपूर्ण, स्मृद्ध तथा मनमोहक बोली है! इसमैं एक शब्द के कई नाम होते हैं! जैसे गंध के लिये, हिन्दी मैं सुगन्ध या दुर्गन्ध कहा जाता है! जबकि अंग्रेजी मैं केवल एक ही शब्द गन्ध ‘smell’ होता है! जैसे भैंस के दूध मैं भैसैन आती है; कपड़ा जलने मैं हन्तरैन; उनी कपडा जलने मैं किहडैन तथा इसी प्रकार गुवैन, रबरैन, कुकैन, बासैन, तितैन, जलैन, मतैन, चुरैन आदि आदि कहा जाता हैं!
इसी प्रकार एक बुजुर्ग किसी चंचल बाला को कृत्रिम गुस्से मैं भावातिरेक से प्यार् स्वरूप या उलाहना देते हुवे 'खड़यूणी’ कहता है तो वह लाड़ली अल्हड बाला मन ही मन मुदित हो, इठलाती, बलखाती, चपलाती खेतों की मीड़ की ओर सरपट भाग जाती है! इसका वर्णन करने मैं बहुत कुछ समझना व समझाना होगा! तभी इसका भावार्थ समझ मैं आयेगा! इसी प्रकार एक दादी या नानी मां या महिला नवजात शिशु को छाती से लगा आशीर्वाद स्वरूप उसकी बलायै लेते हुवे कहती है – तू मर जाली, तू मैं कै खाली, तो पूरा आँगन भाव विभोर हो वात्सल्य की इस गंगा मैं झूमने लगता है! इसमैं अप्रतिम प्रेम तथा वात्सल्य की पराकाष्टा ही तो झलकती है! हिन्दी एक उन्नत भाषा है, जबकी कुमाऊनी एक बोली है! बताया जाता है कि प्राचीन काल मैं कुछ विद्वानों ने हिन्दी वर्णमाला के अक्षरों को काठ (लकड़ी) के अक्षरों मैं ढाल दिया, इसके बाद इन अक्षरों को मुह से फूकने पर वही ध्वनि आइ जिस अक्षर को फूका गया था ! जैसे क से क की ध्वनि निकली, ख से ख की तथा अन्य से उन्ही अक्षरों की ध्वनि निकली! इतनी वैज्ञानिक है हिन्दी वर्णमाला! हालांकि मैदानी छेत्रों मैं जब बच्चे बारहखड़ी बोलते हैं तो वह क को का, ख को खा ग को गा कहते हैं! इस सम्बन्ध मैं मुझे कबीर दास का एक दोहा याद आता है! वह अपने अध्यापक से कहते थे – का खा गा घा मोहे नहीं भाये, राम नाम लिख दे रे पांडे! बाराहखड़ी मैदानी छेत्रों मैं ऐसे ही बोली जाती है! परन्तु पढ़ी सही जाती है! इसी प्रकार शब्दोचारण भी ठीक ही किया जाता है! परन्तु आज अंग्रेजी की छाप जन साधारण के खान पान, रहन सहन यहाँ तक की उसकी सोच को भी प्रभावित कर रही है! परंतु भाषा के छेत्र मैं तो अंग्रेज़ी ने कहर ही ढा दिया है! अंग्रेजी ने तो हमारे सरनेम ही बदल दिये है! आज गुप्त गुप्ता बन चुके हैं; शुक्ल शुक्ला बने, मिश्र मिश्रा बने, तिवाड़ी तिवारी बने और तो और मैं भी बडोला से बरोला बन गया हूँ ! मेरे नाम के ड के नीचे एक बिंदा होना चाहिये, परंतु यह अंग्रेजी मैं संभव ही नहीं है l इसी प्रकार योग योगा कहलाता है, भगवान शिव शिवा बन गये हैं, बस भगवान राम ही ऐसे अकेले भगवान हैं कि वह आज भी राम ही कहलाते हैं, वैसे कई लोगों ने उन्हैं भी रामा बनाने मैं कसर नहीं छोड़ी है ! यह कमाल है अंग्रेज़ी के प्रथम अक्षर ‘ए’ का! प्रश्न है कि ऐसी भाषा जिसमैं मात्र 26 ही अक्सर होने के बाबजूद अन्तर्राष्ट्रीय भाषा कैसे बन गई? हिन्दी मैं 12 स्वर तथा 36 ब्यंजन होते हैं, अर्थात कुल 48 से भी ज्यादा अक्षर होते हैं! इसका मुख्य कारण है इसकी उच्चारण शैली! हिन्दी मैं जो पढ़ा जाता है वही लिखा जाता है परंतु अंग्रेजी मैं ऐसा नहीं है एक फिल्मी गीत मैं कहा भी है कि : बी यू टी बट है तो पी यू ट पुट है, जमाने का दस्तूर कितना उलट है? अंग्रेजी शब्दकोष मैं उच्चारण शैली लिखी रहती है! इस कारण लोगों को किस शब्द का उच्चारण कैसे करना है वह समझ मैं आ जाता है! 
कुमाऊनी को राजभाषा के रूप मैं प्रतिष्ठित करने हेतु देवनागिरी को ही लिपि के रूप मैं अपनाना होगा! जैसा कि इस समय किया जा रहा है! कुमाऊनी मैं बहुत से शब्द हलंत मैं बोले जाते हैं! अतः हलंत, हृश्व, दीर्घ, उर्द्ध, विसर्ग, चंद्रबिन्दु आदि को देवनागिरी मैं शामिल कर इसे सम्रद्ध बनाना होगा! इस बोली को सर्वमान्य समन्वित रूप से विकसित करना होगा! अर्थात नैनीताल, पिथोरागढ़ या अल्मोड़ा के दूरस्त अंचलों मैं एक ही तरह की बोली लिखी जाय, इसका प्रयास करना होगा! इसे (standardization) या मानकीकरण कहा जाता है! 
कुमाऊनी का अपना शब्दकोश होना भी अनिवार्य है! इसके लिये कुछ स्थानों मैं कार्य हो रहा है! कुल मिलाकर कुमाऊनी को भाषा बनाने हेतु इन पांच शर्तों को पूरा करना आवश्यकीय है. (1) लिपि (script); (२) शब्दकोश (3) उच्चारण शैली (4) बोली का मानकीकरण तथा (5) ब्याकरण! इन पांच शर्तों के पूरा होने पर ही हम कुमाऊनी को भारत के संविधान की 8 वीं सूची मैं स्थान दिला सकते है! एक और महत्वपूर्ण बात ! हम लिखैं तो कुमाऊनी मैं लिखैं! बोलैं तो कुमाऊनी मैं बोलैं ! क्या हम ऐसा कर पायेंगे? मात्र आंदोलन करने से कुछ नहीं हो सकता! मुख्य तो यही है की हम कुमाऊनी को स्वीकारैं, घर मैं बोलैं, बाज़ार मैं बोलैं तथा अपने मित्रों से कुमाऊनी मैं ही गपशप करैं! एक बार फिर मेरा प्रश्न है क्या ऐसा कर सकते हैं? क्या हम क्या हम ऐसा कर पायेंगे???


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