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उत्तराखण्ड के लोगों की सहभागिता के बिना चारधाम यात्रा के कोई मायने नहीं हैं। दुखद है कि यात्रा में स्थानीय लोगों की आजीविका का सवाल हाशिए पर डाल दिया गया है।
उत्तराखण्ड में चारधाम यात्रा शुरू हो चुकी है। लेकिन आज जिन हालात और जिस मंशा से यात्रा को हरी झंडी दी गई है, उसके चलते मुझे यात्रा के सुचारू संचालन में आशंकाएं नजर आ रही हैं। ईश्वर करे कि मेरी ये आशंकाएं निर्मूल साबित हो जाएं और श्रद्धालुओं का उत्तराखण्ड के शासन-प्रशासन में फिर से विश्वास जगे। पिछले वर्ष यात्रा पर आए श्रद्धालुओं का राज्य सरकार से पूरी तरह भरोसा टूट गया था। आपदा प्रबंधन और राहत में अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने पुजारियों और कुछ लोगों को हवाई मार्ग से केदारनाथ ले जाकर मंदिर में फिर से पूजा शुरू करवाकर देश-विदेश में संदेश देने की कोशिश की कि यात्रा खुल चुकी है। ‘दि संडे पोस्ट’ के अंक-12, वर्ष 2013 में मैंने अपने इसी स्तंभ में ‘गुमराह न करें बहुगुणा’ शीर्षक से स्पष्ट लिखा भी था कि मुख्यमंत्री भावी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर केदारनाथ के नाम पर सिर्फ देश को धोखा दे रहे हैं। पूजा शुरू करवाकर दिखाना चाहते हैं कि आपदाग्रस्त क्षेत्रों में सब कुछ दुरुस्त हो चुका है।

भगवान की आड़ में जनता को गुमराह करने के बावजूद बहुगुणा की कुर्सी जाती रही। नए मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कुर्सी संभालते ही आपदाग्रस्त क्षेत्रों के दौरे कर लोगों के दिल जीतने की कोशिश की। कहा जाने लगा कि जमीनी नेता होने के नाते वह राहत और पुनर्वास के प्रति चिंतित हैं। रावत ने कहा भी कि राहत और पुनर्वास में तेजी लाने के साथ ही चारधाम यात्रा खुलवाना भी सरकार की प्राथमिकता में है क्योंकि यह सीधे स्थानीय लोगों की आजीविका से जुड़ी हुई है। पुनर्निर्माण के साथ यात्रा के शुरूआत का विचार उचित ही है। लेकिन यदि यात्रा पुनर्वास, पुनर्निर्माण और स्थानीय लोगों की सहभागिता को दरकिनार कर संपन्न कराई जाए तो इसके कोई मायने नहीं हैं। यह महज औपचारिक या आधी-अधूरी यात्रा ही कही जाएगी। लगता है कि मुख्यमंत्री रावत यात्रा शुरू करवाने से पहले स्थानीय लोगों की सहभागिता और जमीनी हकीकतों पर गौर करने में चूक कर गए। समझ में नहीं आता कि उन्हें राज्य के अधिकारियों पर कैसे भरोसा हो गया। पर्यटन विभाग के अधिकारियों के इन दावों पर आंख मूंदकर विश्वास नहीं किया जा सकता है कि पिछली बार की आपदा से सबक लेकर सुरक्षित यात्रा के व्यापक प्रबंध किए गए हैं। एक हल्की सी बरसात ही उनके इन दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। बरसात में जब नदियां उफान पर होंगी तो उनसे एकदम सटी सड़कें जलमग्न हो जाएंगी। नदियों के किनारे तटबंध न होने से पानी का तेज बहाव सड़कों से लेकर शहरों तक को अपने आगोश में समेट सकता है। जब केदारनाथ के लिए जाने वाला मोटर मार्ग और पैदल मार्ग ही ठीक नहीं हो पाया था, तो यात्रा शुरू करवाने की भला क्या उतावली थी? 

दक्षिण भारत की एक कंपनी खुद यात्रियों के बायोमैट्रिक पंजीकरण के लिए आगे क्या आई कि इतने भर से राज्य के अधिकारी अपनी पीठ थपथपाने लगे हैं कि इस बार यात्रा के पुख्ता इंतजाम हैं। यात्रा की तैयारियों पर सवाल उठाने का मकसद किसी सरकार को कटघरे में खड़ा करने का कदापि नहीं है, बल्कि मैं आगाह कराना चाहता हूं कि तैयारियों का धरातल पर जायजा लिए बिना ही यात्रा संपन्न कराना बहुत बड़ा जोखिम लेने के समान है। पिछले वर्ष राज्य सरकार ने तीर्थ यात्रियों का जो भरोसा तोड़ा है, उससे हम आज तक नहीं उबर पाए हैं। ऐसे में यदि इस वर्ष भी बरसात के चलते लोगों को बीच में फंसना पड़े तो तब भविष्य में कोई भी राज्य सरकार तीर्थ यात्रियों का विश्वास हासिल नहीं कर पाएगी। इससे राज्य के तीर्थाटन पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। ध्यान रहे कि उत्तराखण्ड में तीर्थाटन की नींव किसी सरकार नहीं, बल्कि वहां के लोगों ने रखी है। सदियों से वे इसे बचाए हुए हैं। लेकिन आज यात्रा शुरू होने से पहले उनकी आजीविका का सवाल एकदम हाशिए पर डाल दिया गया। केदारनाथ मार्ग पर यात्रा में स्थानीय लोगों की सहभागिता न होना चिंता का विषय है। ऐसा लगता है कि मौजूदा राज्य सरकार ने भी राजनीतिक मजबूरियों में यात्रा शुरू करवाई है।

राज्य सरकार को चाहिए था कि यात्रा शुरू करवाने का उतावलापन दिखाने के बजाए पहले पुनर्निर्माण और पुनर्वास के कार्यों पर ध्यान देती। यदि इसके लिए यात्रा एक साल के लिए रोकी भी जाती तो कोई हर्ज नहीं था। विधिवत कपाट खोलकर पुजारी मंदिरों में पूजा करते रहते। आखिर नंदा देवी राजजात भी तो स्थगित होती रही है। अतीत में भूचालों से जब ज्योतिर्मठ टूटा तो वहां सौ साल तक कोई संत शंकराचार्य नहीं रहा। इससे कौन सी आफत आ पड़ी? पुनर्निर्माण के ठोस प्रयासों के लिए यदि यात्रा रुकती भी तो इसका देश में सकारात्मक संदेश ही जाता। पुनर्निर्माण के बाद 2015 में जब सरकार तीर्थयात्रियों को आमंत्रित करती तो राज्य के यात्रा प्रबंधन को लेकर 2013 में उनका जो विश्वास टूटा था, निश्चित ही उसकी काफी भरपाई हो जाती। लेकिन लगता नहीं है कि राजनीतिक मजबूरियों से विवश कोई सरकार कभी इतना साहस दिखा पाए।


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