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रवाई घाटी के छोडे लामण....जिनमें जिंदगी का असली मकसद छुपा हुआ होता है. जिंदगी भर कठिन भौगौलिक एवं सामाजिक परिस्थितियों से जूझता यहाँ का जनमानस अपनी कथा ब्यथा दिल के उद्गारों में ढालकर उसमें छुपे जिंदगी के दर्द ख़ुशी और प्रेरणा सन्देश से मैन झकझोर देता है- 
जैसे- "हंसी त बोलणु, बांटी खाणु, धरती पिठाडू ना लाणु....
जिउंद मान्सुडिया मरी ज्यान्दा, बुरे बोली कैं क्या पाणु" 
यानी हंस कर बोलने से ख़ुशी ही मिलेंगी बांटकर खाने से संतुष्टि ..कोई भी ऐसा अमर वीर पैदा नहीं हुआ है जिसने यहाँ विजयी पाकर दुनिया को अपने काँधे पर लादकर ले गया हो.इसलिए किसी को बुरा बोलकर या उसका बुरा सोचकर हमें क्या प्राप्त हो सकता है.बुरा बोल और करके हमेशा कटुता और द्वेष ही मिलता है इसलिए जियो और जीने दो वाली बात होनी चाहिए.
ऐसे ही कई छोडे व लामण के बोल या सुर आपको इस घाटी में अनपढ़ महिलाओं, पहाड़ियों के ढाल में भेड बकरियां चुगाते भेडालों के मुंह से सुनाई देंगे जिनमें वास्तव में जीवन दर्शन छुपा रहता है. जाने फिर भी हम क्यूँ तेरा मेरा करते करते इस दुनिया से रुखसत हो जाते है.


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