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घीडी हो या कोठुली, हुक्मरानों द्वारा उपेक्षित गांवों की एक सी कहानी
हुक्मरानों, नौकरशाहों के दंश के साथ जन्म भूमि की उपेक्षा करने वाले बडे सितारों का दंश से व्यथित है उत्तराखण्ड
‘देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के पौडी जनपद मुख्यालय के समीप स्थित पैतृक गांव घीड़ी आज अभी भी मोटर मार्ग से नहीं जुड़ पाया। गांव वालों को आज भी आधा किमी दूर जाना पड़ता है। ’ घीड़ी गांव के बारे में लिखा यह समाचार मेने अपने मित्र अनिल पंत के फेसबुक एक लेख में पढ़ा। इसे पढ़ कर मुझे आश्चर्य हुआ कि पौडी जैसे अंग्रेजों के जमाने से ही विकसित जनपद के मुख्यालय से लगे गांव की जब ऐसी दुर्दशा है तो मेरे सीमान्त व उपेक्षित जनपद चमोली के गांवों की हालत का अंदाजा स्वयं ही लगाया जा सकता है। इस प्रकरण से एक बात स्पष्ट हुई कि या तो खण्डूडी जी सहित प्रदेश के अन्य मुख्यमंत्री उनकी सुनते नहीं थे या डोभाल जी ने मजबूती से मोटर मार्ग के लिए इसकी पहल नहीं की। उनके विरान घर को देख कर मुझे उत्तराखण्ड के हुक्मरानों के कुशासन के दंश से पीड़ित उत्तराखण्ड का असली दर्द प्रतीत हुआ। मुझे नहीं पता कि अजित डोभाल जी ने अपने गांव के विकास में कितना योगदान दिया। परन्तु यह भी सच है कि प्रदेश को न केवल हुक्मरानों व निकृष्ठ नौकरशाहों का दंश झेलना पडा अपितु अपनी अपनी जन्म भूमि को उसके बदहाली पर छोड कर उसकी सुध तक नहीं लेने वाले चमके सितारों की बेरहमी का दंश भी झेलने के लिए अभिशापित होना पडा। अगर प्रदेश के अधिकांश तथाकथित बडे अधिकारी, नेता, उद्यमी व बुद्धिजीवि अपने अपने गांव व क्षेत्र के विकास के लिए जरा सी भी पहल करते तो आज प्रदेश की स्थिति दूसरी होती। हाॅं यह भी सच है ऐसी पहल 4 दशक पहले तक प्रदेश के तीसरी व चतुर्थ श्रेणी की नौकरी करने वाले दिल्ली व लखनऊ सहित अन्य शहरों में रहने वाले उत्तराखण्डियों ने की उससे ही प्रदेश में विद्यालयों, सड़कों, नहरों, अस्पतालों सहित तमाम विकास की नींव पड़ी। परन्तु बडे सितारों व नयी पीढ़ी में ऐसा भाव कहीं देखने में नहीं आता।
हालांकि मोटर मार्ग से हमारा गांव भी नहीं जुड़ा। प्रदेश के जनप्रतिनिधी व हुक्मरान जनहितों का कितनी निर्ममता से उपेक्षा करते है इसका अनुभव मुझे 1964 से जनपद चमोली की सुनला-बिनायक-कोठुली-नारायणबगड़ मोटर मार्ग के नाम से उप्र व उत्तराखण्ड की सबसे पुरानी निर्माणाधीन मोटर मार्ग के अभी तक न बनने से हुआ।
हमारे गांव कोठुली में की मोटर मार्ग नहीं बनी। हेमवती नंदन बहुगुणा से लेकर तिवारी तक के उप्र के मुख्यमंत्री काल में क्षेत्रवालों
ने फरियाद की। पर कोई सुनवायी नहीं हुई। उत्तराखण्ड राज्य भी बन गया। उत्तराखण्ड राज्य विरोधी रहे तिवारी ने सत्तालोलुपता व अपने संकीर्ण मानसिकता के दंश से नव गठित उत्तराखण्ड की पूरी व्यवस्था पर ऐसा ग्रहण लगाया कि प्रदेश अभी तक भारत का सबसे भ्रष्टत्तम राज्यों में शुमार है। वहीं न तो तिवारी व नहीं पूरे देश में सडकों का जाल फेलाने की तकमा लगाये घुमने वाले भुवनचंद खण्डूडी ने वायदा करके भी सुनला-बिनायक खाल-कोठुली-नारायणबगड़ मोटर मार्ग की सुध ली। जब मैने एक पूरा इंटरब्यू प्रदेश के सबसे पुरानी मोटर मार्ग पर लिया तो खण्डूडी जी भी बोल पडे एक मोटर मार्ग के लिए आपने पूरा इंटरव्यू ले लिया। जब वे इस मोटर मार्ग पर चल रहे व्यापक जनांदोलन को देखने के लिए मीलों पैदल चल कर आंदोलित जनता के बीच में गये तो वे कुछ पल के लिए जनता के दर्द को तो समझ ही गये होंगे। परन्तु सत्ता में आसीन हो कर उनको इसका भान ही नहीं रहा। विगत 50 साल से अधिक समय से सरकारें इस 40 किमी मोटर मार्ग नहीं बना पायी। इससे शर्म व नक्कारेपन की दूसरी क्या बात हो सकती है। हाॅं इस मोटर मार्ग के लिए पूर्ण रूप से समर्पित रहने वाली दो दर्जन से अधिक गांवों की हजारों जनता के साथ इस आंदोलन के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने वाले बलवंत सिंह मास्टर जी आज भी निराश हो कर देहरादून में वनवासी जीवन व्यतित करने के लिए विवश है। ऐसा नहीं यहां राजनैतिक उदासीनता व जनता की उदासनता हो। जिला चमोली का भाजपा का जिलाध्यक्ष रिपूदमन सिंह रावत हो या नारायण बगड भाजपा के पूर्व ब्लाक अध्यक्ष पुरूषोतम शास्त्री, नारायण बगड के विकासखण्ड प्रमुख मगन लाल हो या जसपाल सिंह मेहरा भी इसी मोटर मार्ग के लिए समर्पित रहे। भट्टियाणा के सैकडानंद जी हो या धनश्याम देवराडी जी, कोठुली के आनन्दसिंह रावत जी, सेठ सुरेशानंद सत्ती जी हो या बाबा सिंद्धगिरी जी महाराज, सुनभी के पूर्व जांबाज सैनिक कल्याण सिंह हो या पोस्टमास्टर गब्बरसिंह नेगी व कोट के चंदरसिंह नेगी हो या चिरखून के श्रीकृष्ण कांति सहित अनैक समाजसेवी जो इस मोटर मार्ग के लिए संघर्ष करते करते कबके काल कल्वित हो गये परन्तु बेरहम हुक्मरानों को जनांकांक्षाओं को साकार करने की सुध तक नहीं रही। इस मोटर मार्ग के लिए समर्पित राज्य गठन आंदोलन के जांबाज व समाजसेवी पैठेणी के पानसिंह परिहार बिष्ट हो या कोथरा के लाला बलवंत सिंह नेगी, सुनभी के आनन्दसिंह नेगी व कोट की श्रीमती जौशी देगी सहित अनैक समर्पित आंदोलनकारी खुद को ठगे महसूस कर रहे हैं।
निशंक भी वीपीसिंह की तरह कोठुली गांव में लोगों के मतों का हरण करने के लिए भले ही हेलीकप्टर से आकर चले गये। परन्तु न निशंक को व नहीं जनरल टीपीएस, को सतपाल महाराज सहित प्रदेश के तमाम हुक्मरानों की तरह इस मोटर मार्ग को बनाने की सुध रही। न तो उप्र में हेमवती नंदन बहुगुणा इस मोटर मार्ग को बना पाये व नहीं उनके बेटे विजय बहुगुणा ही इस मोटर मार्ग को उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री बना कर ही बना पाये। बनाते केसे इनकी प्राथमिकता ही नहीं थी जनहितों का साकार करने की। इनको केवल अपनी कुर्सी प्यारी रही। अब प्रदेश में हरीश रावत मुख्यमंत्री बने हैं। जब से बने हैं कुछ सप्ताहों को छोड़ कर उनको चुनाव आचार संहिता की लक्ष्मण रेखाओं में शासन चलाना पड़ा। अभी लोकसभा चुनाव के बाद अब पंचाती चुनाव की आचार संहिता लग गयी। उपर से असुरक्षा की तलवार। अगर सरकार सकुशल रही तो हरीश रावत के दर पर मैं खुद इस समस्या को लेकर जाऊंगा। सत्तांध हो कर चूर सरकारें किस निर्ममता से जनहितों की उपेक्षा करके रौंदती है। इसका भान मुझे सुनला-बिनायक खाल-कोठुली-मोटर मार्ग के प्रकरण हुआ।


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