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अविलम्ब गैरसैंण राजधानी घोषित करके उत्तराखण्ड के परमार बने हरीश रावत
गैरसैंण में बन रहे विधानसभा भवन के रमणीक स्थल ‘भराड़ीसैंण’ की छटा का अवलोकन करने के बाद मुझे भी इसका अहसास हुआ कि उत्तराखण्ड की राजधानी गैरसैंण देश में प्राकृतिक सौन्दर्य की दृष्टि से देश के तमाम राज्यों की राजधानियों में सर्वश्रेष्ठ होगी। मैं उत्तराखण्ड राज्य गठन जनांदोलन के अग्रणी संगठन ‘उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा (जिसने संसद की चैखट जंतर मंतर पर 1994 से राज्य गठन 2000 तक ऐतिहासिक धरना दिया) के संयोजक अवतार सिंह रावत व उपाध्यक्ष विनोद नेगी के साथ विजय बहुगुणा सरकार के कार्यकाल में गैरसैंण राजधानी बनाने की दिशा में उठाये गये महत्वपूर्ण कदम ‘ विधानसभा भवन के शिलान्यास’ की पूर्व संध्या पर अपने आंदोलन के साथियों के साथ भराड़ीसैंण उस पावन भूमि को नमन् करने गया था। भराड़ीसैण से विहंगम दृश्य को देख कर मेरे दिल से आवाज आयी कि यह भारत की सर्वश्रेष्ठ प्राकृतिक सौन्दर्य से सम्पन्न राजधानी होगी जहां पर पूरे विश्व के लोग इसकी अनुपम छटा को देखने के लिए आयेंगे। यही नहीं यह पहला शहर होगा, जो आजादी के बाद उत्तराखण्ड में अपनी सरकार द्वारा बसाया गया होगा। नहीं तो उत्तराखण्ड में मसूरी हो या रानीखेत, नैनीताल हो या लैंन्सीडाॅन आदि शहर अंग्रेजों ने विकसित किये। आजादी के बाद उत्तराखण्ड की देवभूमि में दो ही काम हुआ एक भ्रष्टाचार व दूसरा शराब का गटर में पतन के गर्त में गिर कर अपनी सदियों पुरानी ईमानदार व वीरों की देवभूमि की ख्याति जमीदोज कर गया। आज राजनीति के में प्रधान से लेकर विधानसभा में अधिकांश ठेकेदार व बटमारों का बर्चस्व निरंतर बढ़ता जा रहा है और ईमानदार व जनहितों के लिए संघर्ष करने वाले समाजसेवी निरंतर हाशिये में अपमानित हो रहे है। आज जरूरत है उत्तराखण्ड में जनहितों व उत्तराखण्ड की संस्कृति के लिए समर्पित नेतृत्व की। आज सबसे शर्मनाक बात तो यह है कि जिस राज्य गठन व राजधानी गैरसेंण के लिए लाखों लोगों ने सड़क पर उतर कर देश के हुक्मरानों को मजबूर कर दिया था, उस प्रदेश में जनप्रतिनिधि ऐसे विधायक , मंत्री बन गये हैं जिन्हें गैरसैंण राजधानी बनाना भी फिजूलखर्ची लग रहा है। ऐसे बयान देने वालों को बाबा मोहन उत्तराखण्डी सहित राज्य गठन के शहीदों की शहादत करने का दुशाहस कैसे हुआ। इन बेशर्मो को जितना भी धिक्कारा जाय व जितनी भी लानत दी जाय उतना कम है। ऐसे नक्कारे व उत्तराखण्ड द्रोही भ्रष्टाचारी जनप्रतिनिधियों में अगर जरा सा भी जमीर होता तो तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए। गैरसैंण राजधानी तो बनेगी हर हाल में, भगवान बदरीनाथ व केदारनाथ के आशीर्वाद से जनता बना कर रहेगी। परन्तु जिन अभागों ने इस मार्ग में अवरोध खडा करने की कोशिश करेंगे उनको जनता ही नहीं महाकाल भी कभी माफ नहीं करेंगा। राज्य गठन के 14 सालों में पहली बार विजय बहुगुणा ने मुख्यमंत्री होते हुए गैरसैंण की सुध लेने का सराहनीय कार्य किया। परन्तु उन्होंने बाद में इसको अधूरे में छोड़ दिया। अब वर्तमान मुख्यमंत्री हरीश रावत ने न केवल विधानसभा भवन को युद्धस्तर पर बनाने का निर्णय लिया अपितु उन्होंने 9 जून से चार दिवसीय विधानसभा का सत्र जनभावनाओं को नमन् करने के लिए आयोजित करने का ऐतिहासिक कार्य किया। भाजपा हो या कांग्रेस या अन्य राजनेता व तथाकथित समाजसेवियों से मेरा करबद्ध निवेदन है कम से कम 14 साल बाद गैरसैंण राजधानी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल के मार्ग में अवरोध खडा करने की कुचैष्ठा न करें। जो काम पहली निर्वाचित या मनोनित सरकार ने करना चाहिए था वह काम आज 14 साल बाद भी शुरू हो रहा है। राज्य में भाजपा, कांग्रेस, उक्रांद, बसपा ही नहीं अपितु निर्दलीय भी सरकार में भागीदारी निभा चूके हैं अपने अपने कार्यकाल में ये नेता गैरसैंण को राजधानी बनाने की दिशा में पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा व वर्तमान मुख्यमंत्री हरीश रावत जैसी ठोस पहल करना तो रहा दूर ये गैरसैंण के नाम लेने से इनकी सरकारों को मानों सांप सूंघ जाता रहा। इसलिए अब जब इस दिशा में जो सकारात्मक पहल हो रही है उसका स्वागत करना ही एक सच्चे उत्तराखण्डी का प्रथम कर्तव्य है। दुर्भाग्य यह है कि उत्तराखण्ड के अब तक के जितने भी निर्वाचित मुख्यमंत्री हुए(तिवारी, खण्डूडी व निशंक) उन्होंने गैरसैंण पर कदम उठाया होता तो आज उत्तराखण्ड की ऐसी दुर्दशा नहीं होती। बहुगुणा के पास समय था अच्छे कार्य करने का परन्तु वे अपने पथभ्रष्ट सलाहकारों व अनुभवनहीनता के कारण गैरसैंण पर सही कदम उठाने के बाद उसको मुकाम पर नहीं पंहुचा पाये। अब मुख्यमंत्री हरीश रावत के पास शौभाग्य से प्रदेश की सत्ता है। उन्होंने गैरसैंण में विधानसभा का 4 दिवसीय सत्र आयोजित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। मैं राज्य गठन के बाद हरीश रावत सहित तमाम मुख्यमंत्रियों को गैरसैंण राजधानी बना कर उत्तराखण्ड का परमार बनने के लिए प्रेरित करता रहा परन्तु दुर्भाग्य इन अभागों का रहा जो अपनी मातृभूमि की निर्णायक सेवा करने से चूक गये। इन सत्तांधों को इतिहास ही नहीं इनकी आत्मा भी धिक्कारेगी। अब गैंद हरीश रावत के पाले में है, उनको बिना बिलम्ब किये गैरसैंण प्रदेश की राजधानी घोषित कर देनी चाहिए। चाहे वह देवगोड़ा की तरह का ऐतिहासिक कदम क्यों न हो। बिना कुर्सी छूटने का भय से एक पल के लिए भी विचलित नहीं होना चाहिए। सत्ता सदैव न रावण की रही व नहीं किसी चक्रवर्ती सम्राट की। इसने एक दिन इसको विछुडना ही है। परन्तु जो लोग परमार की तरह अपनी मातृभूमि की सेवा कर जाते हैं उनको इतिहास व उनकी सहृदय जनता सदैव याद रखती है। 


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