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कागजों में है सलामत अब भी चेहरा गाँव का
पर नज़र आता नहीं है असली चेहरा गाँव का
बूढ़ी आँखें मुंतज़िर हैं पर वो आख़िर क्या करें 
नौजवाँ तो भूल ही बैठे हैं रस्ता गाँव का
पहले कितने ही परिन्दे आते थे परदेस से
अब नहीँ भाता किसी को आशियाना गाँव का
छोड़ आए थे जो बचपन वो नज़र आया नहीं
हमने यारोँ छान मारा चप्पा चप्पा गाँव का
हो गईँ वीरान गलियाँ, खो गई सब रौनकेँ 
तीरगी में ढल गया सारा उजाला गाँव का
वक़्त ने क्या दिन दिखाए चन्द पैसों के लिए
बन गया मज़दूर आख़िर बच्चा बच्चा गाँव का
हर तरफ़ फैली हुई है बेकसी की तेज़ धूप
सब के सर से उठ गया है जैसे साया गाँव का।


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