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कुमाऊ की वो शादी....जिसने मुझे अचम्भित कर दिया...! काश...हम ऐसी रस्मों का निर्वहन कर ऐसी बहुमूल्य संस्कृति को चिरायु रख पाते...? एक पीड़ा के घाव को भरता ख़ुशी का वह पल जिसका मरहम हमेशा हर दिल को सालता रहेगा.
विगत १५ जुलाई २०१४ को मुझे कुमाऊ मंडल के नैनीताल जिले के एक सीमान्त गॉव (बरतियाकोट) में एक विवाह समारोह में सम्मिलित होने का मौका मिला. दुल्हा दुल्हन दोनों ही एम.ए. बी.एड. और एक शिक्षा विभाग में अध्यापिका तो दूसरा हल्द्वानी में बिजनेसमैन....! पारिवारिक पृष्ठभूमि में लड़की का पूरा परिवार (चाचा ताऊ) अच्छे अच्छे पदों नौकरियाँ करते हैं. लेकिन अपनी संस्कृति के लिए दोनों ने यह ठान लिया कि परिणय बंधन में बंधेंगे तो अपने रीति-रिवाजों का पूरा निर्वहन करते हुए.
मैं जब दुल्हन पक्ष के घर पहुंचा तो एक शामियाने के नीचे घर के आँगन और दीवारों पर दर्रियाँ बिछी थी. वहीँ आँगन के ठीक बीच में महिला संगीत चल रहा था जिसमें दुल्हन की चाचियाँ बहने भाबियाँ और उनके स्कूल की लडकियां कुमाउनी गीतों के रंग बिखेर रही थी.
संसाधनों की कमी के कारण कहें या घरेलु स्थिति के कारण बारात सुबह आनी थी और शाम को वापस होनी थी. देवयोग ने स्थिति ही ऐसी ला दी थी. पुष्पा ने अपने जवान भाई को एक दुर्घटना में खो दिया था. पूरे एक साल पहले हुई इस मौत ने पूरे परिवार को तोड़कर रख दिया लेकिन अपने कन्धों पर अपने परिवार की जिम्मेदारियों को ढोने वाली पुष्पा ने बहुत जल्दी ही इस स्थिति पर काबू पा लिया...ईजा बाजू को बेटे के जाने का एक गम था तो दूसरा बेटी का उसी दौरान हुए रिश्ते के चरमराने का भी भय....!
पुष्पा को जीवन साथी के रूप में मिला वर इस स्थिति को बखूबी जानता था उसने हर संभव कोशिश की कि वह पुष्पा के ईजा बाजू के लिए बेटा साबित हो सके.
वहीँ बाप बेटे के लिए सपने संजोये यही राह देख रहे थे कि अब बेटा इस साल नौकरी लग ही जाएगा क्योंकि उसने पढ़ाई पूरी कर ली थी. माँ संतुष्ट थी कि अब पुष्पा के कन्धों का भार कम हो पायेगा और वह हमारी जिम्मेदारी उठाने की जगह अपनी शादी के ताने बाने बुनने शुरू कर देगी, क्योंकि पुष्पा भले से जानती थी कि भले ही चाचा ताऊ सभी बड़ी बड़ी नौकरियों पर हों लेकिन उसके बाजू ने तो सिर्फ एक चौकीदार की भाँति घर समाज की सारी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर उन्हें इस काबिल बनाया और एक स्वच्छ सोच के साथ बेहतरीन तालीम दी. भला वह उन्हें कैसे आधे अधूरे में छोड़ सकती थी. ईजा बाजू और परिवार के भारी दबाब के बाबजूद भी पुष्पा ने जब तक भाई बहन की पढ़ाई पूरी नहीं हुई शादी के लिए बस इनकार ही किया जबकि ऊपर से सामाजिक दबाब यह कि चाँद की तरह खूबसूरत पुष्पा की शादी की उम्र के साथ लोग कहने लगे कि क्या इसके घरवालों को इसकी शादी की चिंता नहीं है.
लेकिन पुष्पा के मन को भला कौन पढ़ सकता था. भाई अभी अभी प्राइवेट नौकरी पर लगा था. भला होनी को कौन टाल सका. पुष्पा ने राहत की सांस ली ही थी कि चलो अब भाई हो गया है जिम्मेदारियों को समझने वाला. आखिर वह दिन भी आया जब पुष्पा ने शादी के लिए हामी भरी और गुणों की खान समझी जाने वाली इस लड़की को आखिर मन चाहा वर मिला. शघाई हुई तो लगा खुशियों को पंख लग गए देखते ही देखते पुष्पा के चेहरे की रंगत ऐसे खिली मानो यौवन ने खुद आकर उसका श्रृंगार किया हो.
अभी वह खुशियों के स्वप्न भी ढंग से नहीं देख पाई थी कि एक खबर ने उसकी सारी खुशियों को तिनके तिनके कर बिखेर दिया. जिंदगी की खुशियों को जंक लग गया और एक दुर्घटना में हुई भाई की मौत ने सिर्फ पुषपा और उसके परिवार को नहीं बल्कि पूरी गौला घाटी के दोनों छोर पर पसरे क्षेत्र में बसे कई गॉवों को सदमे में ला दिया. माँ बाजू की क्या स्थिति रही होगी यह हम सब जान सकते हैं.
आज उसी पुष्पा की शादी में शरीक होने में देहरादून से उसके गॉव बर्तियाकोट पहुंचा था वह भी सिर्फ पुष्पा के एक फोन पर जिसमें उसके उदास शब्दों में दिया गया हिचकता सा आमन्त्रण कुछ ऐसा था- “ सर नमस्कार, आपको मेम (सुशीला जोशी) ने बता ही दिया होगा कि १५ जुलाई को मेरी शादी है. अगर आपके पास समय रहे तो जरुर आईयेगा. हमें इन्तजार रहेगा.”
सच कहिये किसी और का आमंत्रण होता तो शायद कोई बहाना बनाकर टाल गया होता लेकिन पुष्पा मेम को मैं उसके स्कूल से और उसके कार्य कौशल से पहले से जानता था. यही नहीं उनसे इस लिए भी प्रभावित था कि वह हॉस्टल में पढ़ रही बेटियों को अपना सौ प्रतिशत देकर उनके हर सपने को साकार करने की कोशिश किया करती थी.
उसी फ़ोन ने मुझे देहरादून से नैनीताल जिले के सीमान्त क्षेत्र की इस शादी में शिरकत करने का सुनहरा अवसर प्रदान किया. मेरे साथ मेरा भांजा संजय सुन्द्रियाल भी आने को उत्सुक हुआ उसे भी कुमाऊ की संस्कृति को करीब से देखने का मन था. मैने भी सोचा कि एक से भले दो.
देहरादून से हल्द्वानी तक रेलगाड़ी का सफ़र और हल्द्वानी से शाह जी की टैक्सी से खनस्यू तक का सफ़र कर हम विगत १४ जुलाई को कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय पहुंचे जहाँ से वहां के स्टाफ के साथ मुझे पुष्पा मेम के गॉव तक का सफ़र करना था.
सुशीला मेम ने जब जानकारी दी तो मैं सकते में आ गया. मुंह से बोल नहीं फूट पाए. बात ही कुछ ऐसी थी उन्होंने बताया कि आज पुष्पा के भाई की बरसी (बार्षिक श्राद्ध) है. मैंने आँखे बंद की और ईश्वर का स्मरण कर बुदबुदाते हुए कहा- हे ईश्वर आखिर इस लड़की के लिए ही इतनी अग्नि परीक्षाएं क्यों....?
सुबह हेमू की टैक्सी से हम पतलोट होकर देवस्थान जा पहुंचे यहीं से पुष्पा के घर के लिए एक ऊँची पहाड़ी चढ़कर जाना होता है. हमारे साथ खनस्यू से प्रधान जी, सुशीला जोशी मेम, राधा महरा, मुन्नी, सोनी, बबिता, प्रीती, नीमा, ललिता इत्यादि थे. जिस स्थान पर हम उतरे वहां से ढाल उतरकर मुश्किल से १०० मीटर की दूरी पर देवस्थल था जहाँ एक मंदिरनुमा स्थल था जिसमें लोगों की श्रद्धा के कई घांड (घंटिकायें) लटकी हुई थी. यहाँ से मात्र तीन किलोमीटर की दूरी पर ऊँची पहाड़ी में गुरु बृहस्पति का मंदिर स्थित है. जहाँ जाने के लिए कई बर्जनाएं हैं. खैर यह प्रसंग से हटकर है.
बारात जैसे ही घर के नजदीक पहुंची इंद्रदेव ने अपनी रिमझिम शुरू कर दी सच मानिए मुझे लगा मानों आकाश भी एक भाई की अनुपस्थिति में जैसे रो दिया हो. सफ़ेद घोड़े में बैठा दुल्हा घर के आँगन में दाखिल हुआ वहीँ पहाड़ी रामढोल की धुन पर मदमस्त नाचते लौंडे जवान लड़कियों की तरफ अपना ध्यान आकृष्ट करवाने की कोशिश में लगे थे.मैं घोड़े पर बैठे दुल्हे की फोटो लेने लगा जिनका मेकअप ठेठ रामलीला के पात्र राम की भाँति हो रखा था. माथे पर तिलक और आँखों की भौं के ऊपर से लेकर गालों तक रंग बिरंगे छीटों की सजावट.
अचानक ही देखा दुल्हन का छोटा भाई छाता लेकर आया और अपना छाता दुल्हे को थमाकर दुल्हे से छाता ले लेता है. फिर जो देखा वह मेरे लिए दुर्लभ अनुभव से कम नहीं था. दुल्हे के हाथ में भी लड्डू और पुष्पा (दुल्हन) के भाई के हाथ में भी लड्डू. पहली शुरुआत दुल्हन के भाई ने दुल्हे के नाक का निशाना लेकर तेजी से लड्डू मारा जिसे दुल्हे ने बचा लिया फिर दुल्हे की बारी हुयी तो दुल्हन के भाई ने भी बचा लिया. तीन चार बार यही उपक्रम चलता रहा लेकिन दोनों ही छातों से अपने-अपने को बचाते रहे. यह अनूठी परम्परा मेरे लिए नया अनुभव था जब इसके बारे में जानकारी चाही तो बस एक ही जवाब मिला कि यह एक रस्म है. जिससे में संतुष्ट नहीं हुआ क्योंकि इस रस्म के पीछे जरूर कोई कारण रहा होगा. मैंने पहली बार ही ऐसा देखा जब दुल्हन के पिताजी दुल्हे के पैर धोते हैं. और उनके चरण-पादुका के रज को आँखों तक ले जाते हैं.
खैर कई रस्में हैं जो आम सी रस्मों से मेल खाती हैं, लेकिन पेड़ या घट के साथ विवाह होता देखना एक अलग अनुभूति थी. यह तो सुना था कि जिसके गृह तेज होते हैं यानी जिसकी राशि में राहू केतु शनि प्रभावी हो या फिर सप्तम मंगल या अष्टम मंगल हो उसके लिए उसके अनुकूल ही वर या वधु ढूंढी जाती है लेकिन घट या पीपल/ पदम् के साथ मैंने पहली बार इस तरह वेदी कें दुल्हे की मौजदगी में दुल्हन की शादी होते हुए देखी...मन मैं फिर वही विकार आये कि श्रृष्टि भी जाने क्या क्या परपंच रचती है. क्या यही फूल सी खूबसूरत पुष्पा रह गयी थी इसके लिए भी...क्या ईश्वर को कहीं दया नहीं आई है इसका नसीब लिखते हुए. देखिये न...गुलाब से दमकते चेहरे के वह भाव सिर्फ मैं ही देख सकता था क्योंकि मैंने इस विषय को शादी जैसा नहीं लिया था बल्कि उसके अनुभव का लुफ्त उठाने के लिए एक सोच मन में विकसित की थी..और सी के आधार पर मैं हर चीज को बारीकी से अध्ययन करने की कोशिश कर रहा था. पंडित के मन्त्रों के बीच दुल्हे की मौजदगी में पद्म वृक्ष स्वरुप एक पेड़ की टहनी को घट में खडा कर रौली के साथ पुष्पा के फेरे यानी सात फेरे भले ही एक जगह बैठकर किये या लिए गए हों लेकिन हर लिपटती डोर में पुष्पा के चेहरे पर जो जो भाव आ और जा रहे थे वह महसूस किये जा सकते थे. कल्पनाएँ सागर के ज्वार भाटे की तरह गोते खा रही थी. कभी नजरें सिकुड़ती तो कभी चेहरे पर मायूसी रहती शायद इस अप्रत्याक्षित घट विवाह या वृक्ष विवाह की रस्में उन्हें विचलित किये हुए थी. उनकी सोच में क्या था यह कहना कठिन है लेकिन इस दौरान वह कई बार चोर दृष्टि से दुल्हे के चेहरे के भावों को भी पढने की कोशिश में लगी हुयी थी. शायद पंडित के मंत्रोचारण से पुष्पा या उनके दुल्हे का कोई लेना देना नहीं था..दूल्हा मर्द की भाँती बेपरवाह दिखाई दे रहा था सिर्फ झंझावत पुष्पा के चेहरे पर थे..आखिर नारी इस बात के लिए नारी कहलाती है, जो जमाने भर की पीड़ाओं का बोझ झेलती हुई दुसरे को खुशियाँ लुटाती रहती है.
घट विवाह सम्पन्न हुआ और फेरे शुरू होने लगे..दो महिलाएं मांगलिक गीतों का गायन कर रही थी लेकिन काफी कोशिशों के बाबजूद भी मैं उन तक नहीं पहुँच पाया उन्हें करीब से सुनने का लाभ नहीं उठा सका.
इससे पहले भी कई बातें मैंने देखी थी जो मेरे लिए नई थी..जैसे कि हम जब पुष्पा के घर पहुंचे तो वहां हलकी बारिश शुरू हो गई थी हम उपरी आँगन में बैठे थे जहाँ रोटियों की तरह बनाए गए स्वाले (स्थानीय भाषा का शब्द) आँगन में चट्टाई पर फैलाए हुए थे जिन्हें कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय की बेटियों ने अंदर संभाला. जहाँ पुष्पा अध्यापिका हैं. स्वाले को बनाना एक शुभ शकुन समझा जाता है जिसे गॉव की औरतें बनाती हैं. इसका प्रयोग किस रूप में होता है यह जानकारी लेने का समय नहीं रहा. दूसरी ओर एक और महत्वपूर्ण रस्म पंगत में बैठे धोती बामण की फोटो लेने से बंचित रहा..इसमें तथ्य यह है कि जो भी उस पंगत में बैठेगे वह धोती बांधकर ही खाना खायेगा वहीँ पहले यही बर्जनायें महिलाओं के लिए भी थी कि वह सिर्फ एकहरी धोती के साथ उस पंगत में बैठ सकती हैं. रस्में जिन्दा रहें इस बात का विशेष ख्याल रखते हुए धोती बामण के लिए अलग रसोई की ब्यवस्था थी जबकि आम हम जैसे शहरी लोगों व वर्तमान समाज के अनुयायियों के लिए अलग रसोई थी जिन्हें पैंट व जूते पहनकर ही भोजन करने का शौक सा है.
एक बात और अचम्भे वाली दिखने को मिली बीच बारात के बीच में पुष्पा की बड़ी बहन हाथ में पिठाई की थाली लेकर स्थानीय महिलाओं का तिलक कर उन्हें दक्षिणा स्वरुप एक लिफाफा पकड़ा रही थी जबकि उनके ही पतिदेव एक पूड़े में दो लड्डू मिष्ठान वितरण कर रहे थे. जानकारी चाहि तो पता चला कि स्वाले बनाते समय बारिश आने के कारण उन्हें उस समय तिलक नहीं लगाया गया था. शायद सब अपने अपने में ब्यस्त थे तब यह रस्म पुष्पा की बहन को करनी पड़ी हो. महिला सशक्तिकरण का यह अच्छा उदाहरण था.
अब फेरों के बीच बार-बार दुल्हन द्वारा दुल्हे के पैर छूना यह भी रस्म में बड़ा अटपटा सा इत्तेफाक़ लग रहा था खैर पंडित जो करवा रहे थे उसी विधि-विधान को देखने की ललक थी. अंत में जब दुल्हा दुल्हन जगह बदलते हैं तब एक बेहद ही रोचक सा लगने वाला क्रिया-कलाप देखते ही मेरी हंसी छूट गई. दुल्हन को दायें अंग से बामांग में बैठाने के लिए दुल्हे को रुमाल निकालकर उस स्थान में बिछाना पड़ा जहाँ वह खुद बैठा था...अरे..रे...रे ये क्या .....! बेचारे दुल्हे को पंडित जी का आदेश हुआ की दुल्हन को गोद में उठाकर अब स्थान परिवर्तन करवाओ. पुष्पा हृष्ट-पुष्ट थी जबकी दुल्हे मिंया दुबली काया के ....मैंने सोचा अब तो गए दुल्हे साहब...? लेकिन कहावत है कि मोटे को देख डरना नहीं और पतले से लड़ना नहीं. एक बार के प्रयास में दुल्हे मिंया के पसीने जरुर छूटे लेकिन अगली बारी में उन्होंने तेजी से वह कर डाला जिससे सभी देखने वाले हंस पड़े..एक झटके में दुल्हन को गोद में उठाकर बामांग में विराजमान कर दिया.
शादी के एक आकर्षण में दूल्हा दुल्हन के सिर सजे शेहरे थे..कुमाऊ संस्कृति के ये सेहरे मैंने पहली बार देखे थे. वहीँ जिस तरह आंगन के बीचों बीच वेदिका बनायी गयी थी वह भी निराली थी. न वह वेदिका वाली चतुर्भुज आकृति की माप में थी और न ही उसे कोई उंचाई दी गई थी. सिर्फ जमीन में ही रंगोली से वेदिका का निर्माण किया गया था. केले के पेड़ लाये जरुर गए थे लेकिन सिर्फ प्रतीक स्वरुप लगाने के बाद उन्हें हटा दिया गया. खैर यह शादी मेरे अनुभवों में कई नयी चीजें जोडती हुई संस्कृति के नए स्वरुप की मिठास घोलने के लिए काफी थी. वर-वधु की यह जोड़ी चिरायु हो और दुनिया के हर सुख भोगे. हंसी ख़ुशी जीवन यापन हो..मेरी ओर से यही शुभकामनायें.


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