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श्रीनगर में निर्माणधीन जलविद्युत परियोजना के डीसिल्टेशन बेसिन की चार दीवारें गिरने से इस परियोजना की निर्माता कंपनी-जी.वी.के. के घटिया निर्माण कार्य की कलई एक बार फिर खुल गयी है.पूर्व में भी तीन वर्षों-2008,2009,2010 में लगातार इस परियोजना का कॉफर डैम टूटा और तब हुई जांचों में भी कंपनी द्वारा कार्यों की घटिया गुणवत्ता की बात सामने आई थी.पिछले वर्ष आपदा की विभीषिका को बढाने के लिए भी जी.वी.के.कंपनी उत्तरदायी थी.कंपनी द्वारा नदी तटों पर डाले गए मलबे ने श्रीनगर में बड़े पैमाने पर तबाही मचाई थी.पिछले काफी दिनों से स्थानीय ग्रामीणों द्वारा परियोजना की नहर से पानी के रिसाव की शिकायतें की जा रही थी.यह अत्यंत शर्मनाक है कि जिस परियोजना की निर्माता कंपनी के कार्यों की घटिया गुणवत्ता की शिकायतें बार-बार सामने आई हैं,कांग्रेस और भाजपा के स्थानीय और प्रदेश स्तरीय नेता गण खुल्लमखुल्ला उस कंपनी की पैरवी करते रहे हैं.पर्यावरण मानकों की अनदेखी पर भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने जब परियोजना पर रोक लगाई थी तो स्थानीय विधायक और उत्तराखंड सरकार में मंत्री-मंत्री प्रसाद नैथानी ने अपने गुरु सतपाल महाराज के सानिध्य में दिल्ली में परियोजना के समर्थन में धरना भी दिया था.इस धरने में लोगों को श्रीनगर से दिल्ली ले जाने के लिए बसों का इंतजाम जी.वी.के.कंपनी ने किया था.सवाल यह कि क्या मंत्री प्रसाद नैथानी और उन जैसे अन्य नेतागण,जो जी.वी.के कंपनी के अंध समर्थक रहे हैं, परियोजना की इस लापरवाही और लोगों का जीवन संकट में डालने वाले कृत्य की जिम्मेदारी लेंगे?जो लोग सिर्फ धारी देवी के मंदिर के ऊपर-नीचे होने के नाम पर परियोजना का विरोध करते रहे हैं,उनके लिए भी यह सबक है कि मसला सिर्फ मंदिर और आस्था का नहीं है बल्कि श्रीनगर और चौरास क्षेत्र के अस्तित्व का है.
डीसिल्टेशन बेसिन की चार दीवारें टूटने की इस घटना की गंभीरता को देखते हुए उत्तराखंड सरकार को इस पूरी परियोजना के निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की उच्च स्तरीय जांच करवानी चाहिए.साथ ही कार्यों में लापरवाही और एक बड़ी आबादी का जीवन संकट में डालने के लिए जी.वी.के कंपनी के विरुद्ध आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए और कंपनी के प्रबंधकों और मालिकों की तत्काल गिरफ्तारी की जानी चाहिए.


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