.

.

uttarakhandnews1.blogspot.in










नीति घाटी – चीनी घुसपैठ के बद्स्तूर जारी रहने से प्रभावित है जन-मानस, कैलाश मानसरोवर जाने के लिए सबसे मुफीद है यह रास्ता 

आये दिन चीनी घुसपैठ और दूसरी ओर चीन भारत की अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं पर सम्बन्ध सुधारने की बात और वार्ताएं उस समय बेईमानी लगती हैं जब भारत और चीन की आपसी वार्ताओं के ऐन एक आध दिन बाद पुन: घुसपैठ कर चीन अपनी दादागिरी से भारत को धमकाने का प्रयास करता है. हाल ही में नीति-घाटी के भेडालों (भेड़ चारकों) को भारत की सीमा में प्रवेश कर धमकाने और उनका सामन नदी में फैंकने की खबर ने फिर इस मुद्दे पर गर्माहट ला दी है. भारत के विदेश मंत्रालय के बाद अब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत भी इस बिषय में चिंता जता चुके हैं जबकि चमोली जिले के जिलाधिकारी ने इस मुद्दे पर बिना विदेश मंत्रालय के ही यह वख्तब्य दे डाला कि ऐसी घटना उनके संज्ञान में नहीं है.
नीति घाटी के इस घटनाक्रम पर जिलाधिकारी और मुख्यमंत्री की अलग अलग टिप्पणी ने उहापोह की स्थिति कड़ी कर दी है जबकि सभी जानते हैं कि चीन जानबूझकर ऐसी घटनाओं को अंजाम देकर भारत के बढ़ते अन्तराष्ट्रीय स्वरुप को अस्थिर करने की लगातार जुग्गत में लगा हुआ है ताकि अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर वह कूटनीति के माध्यम से यह स्पष्ट कर सके कि भारत अंतर्राष्ट्रीय पटल पर चीन की उपस्थिति को हलके लेने की भूल न करे.
इस विवाद पर राजनीतिज्ञों की जो भी सोच हो लेकिन भारत की उत्तराखंड और चीन तिब्बत से जुडी यह सीमा वास्तव में अति संवेदनशील है. वर्तमान में भारत के प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह भारत की सीमाओं को सड़क मार्ग और रेलमार्ग से जोड़ने की बात की है और उस पर युद्धस्तर पर कार्य भी प्रारम्भ कर दिया है उससे चीन की बेचैनी ज्यादा बढ़ गयी है क्योंकि लोक निर्माण विभाग और बी आर ओ के सहयोग से नीति घाटी में बनाई जा रही सड़कों को सीमा से जोड़ने की कवायद ने भी चीन की कलुषित मानसिकता को चिढाया हुआ है.
नीति घाटी जहाँ प्राकृतिक दृष्टि से बेहद खूबसूरत नजर आती है वहीँ यहाँ का जनमानस वर्तमान में लगभग 80 प्रतिशत पलायन कर चुका है. नीति घाटी में जाने के लिए जिलाधिकारी या तहसील कार्यालय से अनुमति लेना अति आवश्यक होता है जिसकी रिपोर्ट हेतु पुलिस थाने में दर्ज करवानी जरुरी होता है और एलआईयू जांच के बाद ही आप इस घाटी में अपना पदार्पण कर सकते हैं.इसका. सफ़र जोशीमठसे शुरू होकर तपोवन, लाता, तोलमा गॉव, फाकती, जुम्मा, काणा गॉव, द्रोणागिरी गॉव, झेलम गॉव, मलारी, फाकती,वाम्पा, गमशाली और अंत में नीति गॉव और उसके निकट सीमावर्ती क्षेत्रों में समाप्त होता है.. लगभग ९५ किलोमीटर दूरी तय करके जब हम नीति गॉव पहुँचते हैं तो प्रकृति का अनूठा नजारा आपकी आखों को चकाचौंध कर देता है.गमशाली में जो कि समुन्द्र से १०९५८ फिट की उंचाई पर है वहां भी अपनी सेना (आईटीबी पी) की पैंतीस वाहिनी मुस्तैदी से तैनात है. यहाँ आई टी बी पी की चौकी है जो चौबीस घंटे अपने आँख कान नाक खुले रखकर सजग प्रहरी की तरह अडिग हिमचट्टान बन पहरा देते हैं.
दूर दूर तक फैले हिम ग्लेशियर, कलकल करती नदी का नाद और सत्तू से बनी चाय व खेतीं में आलू फाफला चोलाई की खेती में मस्त यहाँ के जनमानस के मुंह से सुनाई देने वाले गीतों की घमक से घाटी के सुनशान वातावरण में मिश्री सी घुली रहती है. इस गॉव में बने मकान अपने अस्तित्व की उपस्थिति स्वयं दर्ज करवाकर उन दिनों की याद दिलाते दिखाई देते हैं जब इसी घाटी से भारत तिब्बत ब्यापार चीन तक फैला होता था और यह क्षेत्र भोटन्त के नाम से पुकारा जाता था जिससे आगे द्वापा (तिब्बत) तक गढ़ नरेश ने अपनी राजधानी का सीमा विस्तार किया था. जनश्रुतियों और्लोक्गीतों में तब भी इस क्षेत्र पर यहाँ का जनमानस सशंकित रहता था. गढ़वाली लोकगीतों में इस भोतंत क्षेत्र का वर्णन इस तरह मिलता है- “न जा भोटन्त हे नागसुरीजा, तेरु बाबा ग्ये छायो हे नागासुरिजा, घरबौडू नि होयो हे नागासुरिजा” ! 
यहाँ स्थापित शिब मंदिर के बारे में भी कहा जाता है कि गढ़वाल राजा के किसी सेनापति द्वारा इस मंदिर को स्थापित किया गया था जिसकी अपुष्ट जानकारी है. इस घाटी के ज्यादातर गॉव में लगभग बुजुर्ग रहते हैं. जो यहाँ लगभग ६ माह के लिए खेती करने आते हैं. लगभग ३०० परिवारों के इस गॉव में वर्तमान में मात्र ६५ परिवार हैं. यहाँ के लोग बताते हैं कि वे मूल नीति घाटी के ही हैं और तिब्बत चीन से ब्यापार के समय यहाँ आकर बसे हैं. यहाँ पर सिर्फ एक ही दूकान है, जिसमें आप बिना दूध की सत्तू वाली चाय पी सकते हैं. यहाँ आपका कोई भी फोन काम नहीं करता मात्र वायरलेस सिस्टम ही काम करता है. पंचायती गेस्ट हाउस हर गॉव में हैं जिनका संरक्षण ग्रामीण ही करते हैं. खाना व रहना बेहद सस्ता है. भले ही इस गॉव में रहने वाले लोग अपनी सफाई पर ध्यान नहीं दे पाते जिसका मूल कारण यहाँ का ठंडा जलवायु है लेकिन यह भी सत्य है कि यहाँ के ज्यादातर लोग भारत बर्ष के कई प्रतिष्ठानों में बड़े बड़े पदों पर कार्यरत हैं.
नीति घाटी से कैलाश मानसरोवर की यात्रा करना अन्य क्षेत्रों से ज्यादा सरल और सुगम समझा जाता है लेकिन जाने क्यों आज भी इस यात्रा को धारचूला नेपाल से होकर गुजरना पड़ता है जिसके लिए कई कठिन पढ़ाव भी हैं, और चीन की दखलांदाजी से यहाँ भी रूबरू होना पड़ता है. इस क्षेत्र से १४ किलोमीटर आगे तिब्बत बॉर्डर तक सड़क निर्माण हैं जबकि वहां से पैदल ही आगे जाना पड़ता है. नीति से आगे सुमना,जहाँ आई टीबीपी चेकपोस्ट, रिमखिम (5 हजार फिट) ,बड़ाहोती, शिवचिलम तक भारतीय सीमा है इससे आगे तिब्बत बॉर्डर शुरू हो जाता है.जहाँ से आप इयानिमा मंदी, सतलज डोक्यो, मानसरोवर जड़ होकर मानसरोवर की यात्रा कर सकते हैं. वहीँ जहाँ देश के प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने इस क्षेत्र से मानसरोवर की यात्रा को वैकल्पिक मना है वहीँ प्रदेश के मुख्यमंत्री हरीश रावत इस बात पर सहमत नहीं दिखाई दे रहे हैं.
वहीँ इसका एक रूट नीति गॉव से ११ किमी.आगे ग्वालढूंग, ग्वाल ढूंग से १५ किलोमीटर आगे नीतिपास होता हुआ १४ किलोमीटर आगे सरक्या तक जाता है. जहाँ से तिब्बत की सीमा प्रारम्भ और भारतीय सीमा समाप्त हो जाती है. यहाँ से भी आप गिग्गुल, अलंगतारा, छो-मिसर, छोक्योसर, मानसरोवर जड़ होकर मानसरोवर तक पहुँच सकते हैं. भारत सरकार वर्तमान में अपनी सीमा को सड़क से जोड़ने के लिए लोक निर्माण विभाग के माध्यम से तिब्बत बॉर्डर तक सड़क बनवा रहा है.
नीति घाटी के लोग इस समय ६ माह के प्रवास में अपनी खेती का विशेष ध्यान रखते हैं जिसमें राजमा मटर आलू व चौलाई बोई जाती है. यहाँ शराब का प्रचलन बहुतायत मात्रा में है. हर घर में कच्ची शराब चाय की तरह प्रचलन में है जिसका मूल कारण यहाँ के पर्यावरण के ठंडा होना है.यहाँ का जनमानस बेहद सरल और भोला है जो अपनी भरसक कोशिशों में आतिथ्य संस्कार के लिए हर हमेशा तत्पर रहता है लेकिन यह भी सत्य है कि इस जनमानस में अपनी उपस्थिति दर्ज करने के लिए आपको मशक्कत करनी पड़ती है. 
नीति घाटी को अगर प्रदेश सरकार पर्यटन व्यवसाय से जोड़कर राजस्व वृद्धि करना चाहती है तो सच मानिए इस घाटी में बसे सभी गॉव फिर से खुशगवार हो गुलजार हो जायेंगे और इस घाटी की अनमोल संस्कृति का लुप्त हम लम्बे समय तक उठाकर न सिर्फ इन उजड़ते गॉवों को बसाने में सफल रहेंगे अपितु लाभांश का एक बड़ा हिस्सा लेकर यहाँ के युवा के कदम अपनी सीमाओं में दृढ़ता के साथ जमे रह सकते हैं. बशर्ते गृहमंत्रालय इस क्षेत्र को सीमा क्षेत्र देखते हुए अति संवेदनशील न माने.


See More

 
Top