.

.

uttarakhandnews1.blogspot.in



लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी की मिरजई टोपी ...! गैरसैंण से नंदा राज जात तक पहुंची....!
माना गलती सही सही लेकिन प्रदेश के नेताओं ने आखिर अपनी पहचान वाली मिरजई टोपी को गैरसैण विधान सभा सत्र में अपने सिर में धारण कर उत्तराखंड की संस्कृति को पुनर्जीवित करने का प्रयास तो किया. 
शायद लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी ने यह कभी नहीं सोचा होगा कि बर्षों से जिस टोपी का मान वे बड़े बड़े मंचों पर पहनकर बढाते हैं उस टोपी के इस तरह पुन: दिन बहुरेंगे.
लाल मिरजई टोपी को गैरसैंण में सभी नेताओं के सिर सजाने वाले विधान सभा उपाध्यक्ष अनुसूया प्रसाद मैखुरी ने इन्हें कितनी हसरत और मेहनत से संजोया यह उनकी संस्कृति के प्रति झलकती एक ईमानदार पहल कही जा सकती है. 
यही टोपी अब नंदा राज जात में भी दिखने को मिली..तब लगा कि वास्तव में नेगीजी से पुन; शुरू हुई यह विरासत ठेठ वैसा ही रंग लेने वाली है जैसे हिमाचल प्रदेश की कनौरी टोपी को वहां के आम आदमी और नेता शान से सिर पर सजाते हैं.
मिरजई नाम से मशहूर इस टोपी को अक्सर उसके लुक से कनौरी भी कहा जाता है लेकिन इसके चौकोर क्षेत्र में सुई तागे के काम ने इसके लुक में हलकी तब्दीली कर इसे मिरजई का रूप दे डाला..!
मुझे अच्छे से याद है कि विधान सभा सत्र (गैरसैण) में यह टोपी विधायक, मंत्री और पत्रकारों के लिए मंगवाई गई थी लेकिन नेताओं के चमचों ने इन पर ऐसी सेंध मारी कि अनुसूया अप्रसाद मैखुरी जी को उस समय शर्मसार होना पड़ा जब इस सत्र की याद को अपने से संजोने के लिए पत्रकारों ने उनसे इस टोपी की मांग की. आनन् फानन मुख्यमंत्री जी द्वारा पत्रकारों के लिए शुद्ध ऊन से बने दुशाले उपलब्ध करवाए.
सच कहूँ तो इस टोपी के लिए मैं भी काफी लालायित था क्योंकि इससे एक संस्कृति का परिचय जो मिलता है. ऐसी संस्कृति जिसकी आन बान शान बस टोपी ही होती है.
धन्यवाद भाई शैलेन्द्र जोशी जो आपने इस और मेरा ध्यान केन्द्रित किया और कहा कि इस पर ही कुछ रच लूं.


See More

 
Top