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27 वर्षों बाद टिहरी राजदरबार से मां नंदा की पूजा के लिए राजवंशी चांदपुर गढ़ी पहुंचे। टिहरी नरेश के प्रतिनिधि के तौर पर ठाकुर भवानी सिंह ने आराध्य श्रीराजराजेश्वरी के दर्शन कर पूजा-अर्चना की और उन्हें हिमालय के लिए विदा किया। गढ़ी में हजारों की संख्या में नंदा भक्त शामिल हुए। गढ़ी का हर हिस्सा नंदा के जयकारों से गुंजायमान था। हर रास्ते और गली पर महिलाएं मां नंदा के भजन-कीर्तन कर रही थीं। 
बृहस्पतिवार प्रात: आठ बजे से ही 36 राजाओं की प्राचीन राजधानी चांदपुर गढ़ी में नंदा के दर्शनों को भक्त पहुंचने लगे थे। प्रात: 11 बजे तक सिरोली से जीआईसी आदिबदरी तक लगभग छह किमी के दायरे में वाहनों का जाम लग चुका था, जबकि सड़क से लेकर गढ़ी तक 300 मीटर के रास्ते में पैर रखने तक की जगह नहीं थी। दोपहर तक चटक धूप और नंगे पांव खड़े होकर भक्त अपने आराध्य के दर्शनों के लिए पलक-पावड़े बिछाए हुए थे। दोपहर सवा दो बजे कांसुवा से होते हुए मां नंदा की छंतोली, चौसिंग्या खाडू के साथ टिहरी के राजा के प्रतिनिधि ठाकुर भवानी सिंह गढ़ी के मंदिर में पहुंची। उन्होंने गढ़ी के प्राचीन मंदिर में मां दक्षिणकाली की पूजा करते हुए राजदरबार की ओर से भेंट अर्पित की। इसके बाद उन्होंने गढ़ी के मुख्य प्रवेश द्वार पर भी आराध्य की पूजा की और उसे हिमालय के लिए विदा किया। राजजात समिति के अध्यक्ष डा. राकेश सिंह कुंवर ने भी पूजा की। गढ़ी के मुख्य मंदिर में राजछत्र के साथ पहुंची नौंना, देवल, नैंणी, मलेठी की छंतोली और चौसिंग्या खाडू के दर्शनों के लिए भारी भीड़ लगी रही। मां नंदा अपनी बहन श्रीराजराजेश्वरी से भी मिलीं। करीब साढ़े चार बजे राजछंतोली और चौसिंग्या खाडू के साथ राजजात ने अपने चौथे पड़ाव सेम के लिए प्रस्थान किया।
एक दिन में एक लाख से अधिक पहुंचे श्रद्धालु
बृहस्पतिवार को चांदपुर गढ़ी में आस्था और भक्ति के जनसैलाब ने राजजात में भक्तों की भीड़ के रिकार्ड तोड़ दिए हैं। एक ही दिन में एक स्थान पर मां नंदा के दर्शनों के लिए एक लाख से अधिक भक्त उमड़े। प्रात: छह बजे से ही श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, गौचर, कर्णप्रयाग, गैरसैंण और पिंडरघाटी और कुमाऊं मंडल से भक्त वाहनों में यहां पहुंचने लगे थे। वर्ष 1998 में पूरी राजजात में 10 से 15 हजार लोग शामिल हुए थे, जबकि वर्ष 2000 में चांदपुर गढ़ी में गढ़-कुमाऊं से 40 से 45 हजार लोगों ने नंदा के दर्शन किए थे। इस बार यह आंकड़ा एक लाख से अधिक पार कर गया। भविष्य के लिए भी भक्तों के इस सैलाब को उत्तराखंड, विशेषकर पहाड़ के पर्यटन के लिए वरदान समझा जा रहा है।
विदेशी और मासूम भी रहे आगे
नंदा के दर्शनों के लिए महिलाएं, पुरुष और बुजुर्गों के साथ-साथ बच्चे भी पीछे नहीं रहे। कई लोग तो अपने छह माह से डेढ़ साल के बच्चों को लेकर आए थे। चटक धूप में कुछ समय के लिए ये मासूम परेशान होते रहे, लेकिन नंदा की कृपा ऐसी रही कि वे फिर शांत हो जाते। वहीं पुर्तगाल से आईं नंदा भक्त मुर्तशा भी चांदुपर गढ़ी पहुंची। नंदा और भक्तों के हर भाव को उसने अपने कैमरे में कैद किया। इस दौरान वह लोगों से नमस्ते और जय नंदा के बोल भी बोलती सुनाई दीं।


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