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फुर्र घिंडूडी आज़ा......?
पहाड़ कहीं का भी वह उसके परिवेश को अंगीकार करने वाली गौरय्या (घेंडूडी) से हर काल में हम सभी मानव प्राणियों का एक स्नेहिल नाता रहा है क्योंकि यह हमेशा हमारे घर आँगन में अपने छोटे छोटे पंखों की फुर्र फुर्र के साथ दाना चुगती और मटकती दिखाई देती है ठेठ उसी तरह जिस तरह मुस्लिम समाज में कबूतर...!
बस फर्क इतना है कि ज्यादातर कबूतर बलि चढ़ते हैं जबकि घेंडूडी निर्ध्वन्ध रूप से जनमानस के बीच प्यार पाती रही बांटती रही.
परसों जब मैं अपनी बड़ी बहन के आँगन में बैठा उसे चावल बीनते देख रहा था और बार बार वह कुछ चावल के दाने उछालती हुई - ले आ आ आ...! शब्द मुंह से निकालती तब कई घेंडूडी (गौरय्या) माल्टा मौसमी के पेड़ से उड़कर आते और वह दाना चुगने लगते वह दीदी के इतने करीब जाकर बिना डर दाना ही नहीं चुगते बल्कि टुकुर-टुकुर उसकी आँखों में भी तकते. कोई और उधर से गुजरता तो वे फुर्र से उड़कर फिर पेड़ की शाखाओं में चली जाती.
मुझे अपने बचपन के वो दिन याद आ गए जब माँ अन्न सुखाने डालती तो पास ही बहुत सारे झंगोरा के दाने बिखेरती रहती. तब गौरय्या यूँही आकर उसे चुगते थे. यही नहीं बीच में कौवा या सेंतुला अगर आकर खलल डालते तो वह सब चीन्ही चीन्ही करती माँ के करीब जाकर माँ से शिकायत करती थी...मैंने कई बार माँ के कन्धों में धोती के पल्लू में गौरय्या को झूलते देखा है. सच में आज भी जब गॉव जाता हूँ और सूने उजड़े आँगन के वे पल याद करता हूँ जिनमें माँ की लोरियां यादें और अतीत के कई क्षण कैद हैं याद आते हैं तो आंसू टपक पड़ते हैं.
मुझे आज इस बात की बेहद ख़ुशी थी कि माँ का अनुशरण करती उसकी बेटी (मेरी बड़ी बहन) ने भी उन पक्षियों को वही आलिन्घन वही प्यार दिया हुआ है जो माँ दिया करती थी शायद इसीलिए कहा भी जाता है कि बेटी के साथ माँ के संस्कार जाते हैं. 
मित्रों हम भी इन मूक प्राणियों पर अपना स्नेह लुटा सकते हैं बस थोडा सब्र और उनकी समझ को समझने के लिए हमें भी इस तरह के जतन करने पड़ेंगे.द्या और धरम यही है कि हम अपने साथ साथ दुसरे का भी निस्वार्थ ख़याल रखें तो अपने किये से मिली आनंद की अनुभूति हमें हमेशा ही आलाह्ति करेगी.
वर्तमान में पलायन ने यूँ तो पंडितों के जयादातर गॉव खाली कर दिए हैं खेती बंजर है और पशु पक्षी भी मन मसोसकर अपना घरोंदा बदलने लगे हैं, ऐसे में कुछ पक्षी अगर हमारी सहानुभूति पर अपनी देवभूमि का स्पर्श पाते रहेंगे तो हमें खुश होना चाहिए.


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