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Urmi Negi 



आलेख : राकेश पुंडीर -- मुंबई (पत्रकार)
मित्रो !
उत्तराखंडी फिल्म जगत के ३ दशक के इतिहास मेँ ३ फिल्मे ही ऐसी निर्मित हुई जिनकी उत्तराखंडी फिल्म जगत में कई वर्षो तक चर्चा रही व् जिन्हे देखने की उत्सुक्ता प्रत्येक उत्तराखंडी में रही और इन फिल्मो ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के झंडे गाड़े। आज मैने बर्तमान में झाँका तो पाया की फिल्म "सुबेरौ घाम " भी यही इतिहास दोहरा रही है। कदाचित यह फिल्म इतिहास के रजत पन्नो पर स्वर्णिम अक्षरो में नाम अंकित कर गयी है। मुंबई जैसे महनगर जहाँ उत्तराखंडी प्रवासियों की तादात दिल्ली या देहरादून जैंसी नही है फिर भी इस फिॅल्म ने मुंबई के प्रत्येक क्षेत्र (अपवाद अरोडा थिएटर छोड़ ) जहाँ भी यह फ़िल्म प्रदर्शित हुई हाउसफुल के साथ सफलता के झंडे गाड़ दिए हैं। क्या यह मृत्युप्राय: हो रही उत्तराखंडी फिल्म इंडस्ट्री को सजीवनि देने जैसा नही ?
ऐसा पहली बार हुआ की अनगिनित पहाड़ी जनमानस में फिल्म को दुबारा देखने की ललक जागृत हुई। कई प्रवासी व्यक्तिगत रूप से दूरभाष पर लगातार विशेष रूप से महिलाये फिल्म की टीम से अनुरोध कर रही हैं कि फिल्म को उनके क्षेत्र त्र में भी कृपया प्रदर्शित करें।
मै नवी मुंबई में निवास करता हूँ मुझे प्रथम बार भांडुप के कृष्ण थियेटर में प्रथम शो देखने का मौका मिला यह मेरा सौभाग्य है की गत रविवार को मुझे अपने क्षेत्र नयी मुंबई के बालाजी मल्टीप्लेक्स में दुबरा देखने का अवसर प्राप्त हुआ ..। फिल्म की समीक्षा मै पूर्व में ही कर चूका हूँ इसलिए फिल्म के कथानक पर न जाकर मै सिनेमा हाल के अपेक्षित माहौल व् प्रदृश्य से अवगत करना चहुंगा .... भोर ७. ३० से ही इस फिल्म को देखने के उत्सुक लोग एक दूसरे को दूरभाष पर जगा रहे थे, कि…… हे भै अबार तक सेयुं चा , हफार सुबेरौ घाम ऐगे …चला उठा … गाड़ी निकाला ……कखि देर न हो भै … ठीक ९ बजे शुरू ह्वे जांण बल … सुबेरौ घाम …
और सुबह सुबह इस व्यस्त मुंबई में ८. ३० से ही नयी मुंबई के कोपरखैरणे स्थित बालाजी मल्टीप्लेक्स में दर्शको की कतार लग चुकी थी। संदेशप्रद फिल्म के कारुणिक दृश्यों को देखते देखते कुछ महिलाओ का करुण क्रंदन श्नवणीत हो रहा था कहते है की किसी भी फिल्म के दो बहुत ही कठिन कार्य होते हैं की सीन के माध्यम से दर्शक को दिल से हँसाना अथवा दिल से रुलाना दोनों ही विधाओ में यह फिल्म खरी उतरी है।
फिल्म समाप्त हुई और लोग भरी मन से हॉल से नीचे उतरने लगे.… मेरे विशेष अनुरोध पर फिल्म की निर्मात्री एवं नायिका उर्मि जी हॉल में मध्यांतर के पश्चात पहुँची थीं..... किसी को विदित नहीं था के वे यहाँ पहुँची हैं नीचे फ्लोर पर पहुँचने पर कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओ व् गणमान्य महिलाओ से मैंने उर्मि जी का जैसे ही परिचय कराया वह दृश्य कदाचित मैं अपने जीवन में कभी नही भूल पाउँगा …।
महिलाये उर्मि जी को सामने पाकर इसकदर भावविभोर हो गयी की उनको गीली आँखों से " भेटण " (भेंटने) लगी और यह सिलसिला बहुत देर तक चलता रहा … उन महिलाओं का प्रेम, बात्सल्य , अनुराग , दुलार, व्याकुलता , तृष्णा , स्नेह , ममत्व , ममता , मर्म की अनुरक्ति और आसक्ति की प्रचण्ड अभिव्यक्ति को एक संवेदनशील व्यक्ति भी अभिव्यक्त नहीं कर सकता ……उन महिलाओ ने कदाचित उर्मि जी के पात्र को परदे पर अपने जीवन के उन पहलुओ में देखा जिन्हे वे पीछे छोड आई हैं। उन महिलाओं की मनोभाओ की पराकाष्ठा को मै अपने कमजोर शब्दों द्वारा बयान नही कर सकता ……… 


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