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क्या सच में समाप्ति की ओर है गंधर्बों का युग....? बिलुप्त सी हो गई है गढ़वाल मंडल की बादी जाति.!


जिन्हें हम जन्मजात कवि और नर्तक कह सकते हैं, जिन्हें हम फसल बोने से लेकर कटने तक उलाहने दे सकते हैं.जिन्हें राजाओं, सामंतों, जमीदारों, थोकदारों की चौखट के फनकार कह सकते हैं आज ये सब शिब भक्त गंधर्ब जाने किस रसातल में बिलुप्त होकर गुमनामी के अंधेरों में खो गए हैं.
गढ़वाल मंडल में जिन्हें बेड़ा (बद्दी/बादी). मिरासी, ढाकी-धियाड इत्यादि नामों से पुकारा व जाना गया है वर्तमान में ये जाति और इसके लोग कहाँ लुप्त हो गए हैं यह कहना असम्भव सा है. वेदों का अगर ज्ञान लिया जाय तो सामवेद में बेड़ा अर्थात बादी को शिब का आदेश है कि- "भूतानि आचक्ष्व, भूतेषु इमं यजमान अध्वर्यु:" अर्थात इतिहास कहा, क्षेत्र के इतिहास अर्थात ऐश्वर्य में यजमान की रूचि उत्पन्न करो.! इसे औसर भी कहा गया है जो एक ब्राह्मण के मुख से निकले शब्द को बेड़ा के लिए आज्ञा कही गई है जिसके अनुरूप ही बेड़ा अपने पूरे जोश-खरोश और शिब के गुणगान के बाद खंडबाजे शब्द का उद्घोष कर अपने यजमानों की जयवृद्धि का मंगलगान करता है. 
परात नृत्य, थाली नृत्य, शिब-पार्वती सम्बन्धी नृत्य, नट-नटी नृत्य, दीपक नृत्य, लांग खेलना, काठ खेलना एवं सम सामायिक गीत व नृत्यों से मन मोहना इस जाति का सबसे बड़ा कर्तब्य समझा जाता था. वर्तमान में भी ये सभी पैतृक गुण इन लोगों में विदमान हैं लेकिन बदलती संस्कृति और लोक ब्यंजनाओं ने हमारी इस कला और इसके पारखियों को चौपट कर दिया है. ये सम सामायिक घटनाओं के ऐसे कवि हैं कि किसी भी घटना पर कब लोक काव्य रच दें और कब उसे नृत्य और गायन में ढालकर प्रस्तुत कर दें कहना सम्भव नहीं है. 
इस जाति और इस जाति के चितेरों पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है. सच कहूँ तो मेरे पास इस से सम्बंधित ब्यापक शोध भी है जिसे मैं प्रकाशित करने जा रहा हूँ. हाँ कोई पत्र पत्रिका वाला मित्र अगर यह इच्छा जताए कि ऐसा आलेख उनके पत्र पत्रिका में छपे तो वे मुझे निर्देश दे सकते हैं.
बहरहाल यह फोटो मुझे अपने कवि मित्र जगमोहन सिंह जयाडा " जिज्ञासु" जी के सौजन्य से प्राप्त हुयी है जिसमें वे स्वयं भी मौजूद हैं तब मुझे लगा कि क्यों न जयाडा थोकदार और गंधर्ब कला के ज्ञाता इन लोगों पर चंद शब्द लिखे जाएँ ..मेरा सुझाव और प्रस्ताव भी आमंत्रित है कि अगर कोई इस विधा का व्यक्ति या लोककलाकार इस कला को जीवित रखने में सक्षम है तो सरकार व अन्य स्रोतों से हम उन्हें पूरी मदद पहुंचाएंगे वरना यह जाति और परंपरा समाप्त हो जायेगी जिसे हमें संभालने की आवश्यकता है.


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