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भगवान पुर में कांग्रेस नहीं बल्कि सुरेन्द्र राकेश जीते हैं ..काश की गढ़वाल में भी कोई सुरेन्द्र राकेश होता ..उन जैसा बेबाक इन्सान मैंने नहीं देखा ..2007 की विधानसभा में जब मुछ्याल बौडा ने शराब की दुकान आठ बजे ही बन्द करने के आदेश दे दिए थे तो विधानसभा के अन्दर उन्होंने ये मुद्दा बड़ी बेबाकी से उठाया था ..तब पता चला की महाशय सुरेन्द्र राकेश हैं ...अपने पहाड़ के नेताओं में भगत दा को छोड़ कोई ऐसा नेता ना देखा जो खुद आये हुए की तकलीफ समझे और निवारण करे | दिल्ली उत्तराखण्ड सदन में सत्ता की उठक बैठक में बिजी दा से कोई भट्ट जी मिलने आये ..भट्ट जी ने कहा तो कुछ नहीं .बस बोले बीबी बीमार है ईलाज के लिए लाया हूँ ..पर दा ने तुरन्त उनके रहने की व्यवस्था कराई और किसी भी काम के लिए तुरन्त सूचित करने को कहा ...ऐसे ही कुछ सुरेन्द्र राकेश भी थे ..उनकी विधानसभा क्षेत्र के युवा कहीं न कहीं सरकारी क्षेत्रों में फिट हैं ..येन केन प्रकारेण ..और परिवहन निगम का नाम भगवान पुर कर दिया जाय तो अतिश्योक्ति नहीं होगी ..वे जानते थे की नियम कानून व्यवस्था की बात करके अपने लोगों का भला कभी नहीं हो सकता ...उनपर उनकी इसी बेलौस स्वाभाव के कारण भ्रष्टाचार के आरोप लगे ... एक ईमानदार आदमी का शोषण रुकवाने व स्थानांतरण करवाने में जिस अंदाज में उन्होंने हमारा काम किया उसी दिन से ऐसे आदमी का मुरीद हो गया था ..ये बात अलग है की भ्रष्ट समाज कल्याण अधिकारियों ने उस पूरे प्रकरण को अमर उजाला में ऐसे खबर बना कर छपवाया कि मन्त्री महोदय ने कितने बड़े भ्रष्टाचारी को बचाने में जी तोड़ मेहनत की हो ...पर उन पर कोई फर्क न पड़ना था न पड़ा ...जहाँ खुद को ये आदत पड़ी हुई थी की अपनी क्षेत्रीय पार्टी के नेताओं पर किसी काम के लिए जाते ही ये अंदाज लगाया जाता था की कितना कमा रहा होगा .. और काम के लिए चक्कर पे चक्कर ..और फिर टांय टांय फिस्स ..वहां राकेश जी का एक बार में ही बिना कुछ कहे सुने काम कर देना ऐसा सुखद हवा का अहसास था ...और आज वाकई भगवानपुर की जीत कांग्रेस की जीत नहीं है ..सुरेन्द्र राकेश जी के कामों की जीत है ..भले ही लोग उन्हें अपनी अपनी कसौटी में अलग अलग तोले मगर असली तोल और मोल तो जनता की कसौटी ही है


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