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आत्ममुग्धता क्या होती है यह मैंने कल जाना जब अपने अनुज भ्राता कविन्द्र इष्टवाल को एक बड़े मंच पर मुख्य अतिथि की भूमिका में विराजमान देखा.
कविन्द्र यों तो राजनीतिज्ञ एवं सामाजिक क्षेत्र में आज एक बड़ा नाम है लेकिन साहित्यिक क्षेत्र और वह भी अपनी लोक भाषा से जुड़े मंच पर उन दिगजों के बीच जो आम जनता के आइडियल हैं.
कविन्द्र यों तो बेहद सहृदयी व्यक्तित्व के धनि और सुमधुर वक्ता हैं, उनका व्यवहार ही ऐसा है कि एक बार आप मिल लो तो मुरीद हुए बिना नहीं रह सकते.
कल सुप्रसिद्ध कवि साहित्यकार, कहानीकार, पटकथा लेखक व अभिनेता मदन डुकलान की दो पुस्तकों के विमोचन के अवसर पर खांटी लोक कला विधों और साहित्यकारों के मध्य बैठे कविन्द्र को बस मैं निहारता ही रहा. शायद यह आत्ममुग्धता इसलिए भी हो कि कविन्द्र हमारे इष्टवाल खानदान के ऐसे चिराग हैं जो प्रसिद्धी की उंचाईयां छू रहे हैं.
यह पोस्ट कविन्द्र को इसलिए भी समर्पित है कि कविन्द्र पहला ऐसा व्यक्तित्व उस मंच पर थे जिन्हें कई साहित्यकारों लेखकों व लोककलाकारों ने पहली बार ऐसे मंच पर देखा होगा.
आत्ममुग्धता का वह दौर सच कहूँ तो अभी भी ह्रदयपटल पर ज्यों का त्यों है..शायद मेरे सीने में अभिमान था, मेरी नजरों में कविन्द्र के लिए सम्मान था और उससे भी ज्यादा इस बाद का गर्व की अपना भाई जिस मंच पर मुख्य अतिथि के रूप में विराजमान था वह मंच राजनीति के उन महाकलाकारों चाटुकारों का नहीं था जो जनता को बरगलाकर अपने पक्ष में खड़ा करते हैं बल्कि वह मंच ऐसा था जिसमें सिर्फ मंचासीन ही नहीं बल्कि दर्शक और श्रोता भी बुद्धिजीवी समाज के थे जिनकी कलम की धार ने समाज को एक ऐसा आइना दिया जो मदन डुकलान की काव्य रचना "हमरु ऐना हमरी अन्द्वार" जैसा ही सामाजिक सोच विकसित करता है.
विगत 3 अप्रैल 2015 को कवि व साहित्यकार मदन मोहन डुकलान जी की दो नये काव्य संग्रहों "अपणो ऐना अपणी अंद्वार" और "चेहरों के घेरे" का लोकार्पण हुआ। एक तरफ जहां "अपणो ऐना अपणी अंद्वार" उत्तराखंड आंदोलन शहीद और अपनी संस्कृति सभ्यता पर लिखी हुई गढ़वाली कविताओं, गीतों तथा गजलों का संकलन है वहीं दूसरी तरफ "‘चेहरों के घेरे" पहाड़ में बढ़ती बेरोजगारी, पलायन आदि के बिंदुओं पर केंद्रित करता हुआ हिन्दी काव्य संकलन है।
गणेश खुगशाल "गणी" के संबोधन के बीच यह कार्यकम संपन्न हुआ जिसमें कार्यक्रम की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध गीतकार व लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी, मुख्य अतिथि समाजसेवी श्री कवींद्र इष्टवाल, विशिष्ट अतिथि उद्योगपति डा. जेपी सेमवाल, लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी, साहित्यकार श्री देवेन्द्र प्रसाद जोशी और श्री राजेश सकलानी तथा समय साक्ष्य प्रकाशन से श्रीमती रानू बिष्ट ने पुस्तकों का लोकार्पण किया।


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