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पहाड़ में ऊँचाइयों पर बुरांश (Rhododendron) खिलने लगा है. बुराँश खिलने के बाद पूरा जंगल रक्तिम आभामय हो जाता है बुरांश का घंटी सदृश फूल गंध रहित होता है. बचपन में इन फूलों को खूब चाव से खाते थे होंठ लाल-लाल हो जाते थे.. उत्तराखंड जन-जीवन और संस्कृति में रचे-बसे बुरांश के फूल को, श्री रतूड़ी जी, अज्ञेय जी, पन्त जी, श्री कान्त वर्मा जी जैसे नामचीन कवियों ने अपनी रचनाओं में महत्व दिया दिया है. बुरांश को राजस फूल माना जाता है ।
प्रस्तुत है बुरांश पर एक प्रयास .... ..
...........बुरांश..........
रौद्र रूप में आज योद्धा
दुर्गम ऊँचाई पर आ डटा
सुगंध छल ले गयी हवाएं
लौट अब तक आई नहीं..
रक्तवर्ण हो रहा क्रोध में
उन हवाओं के इंतज़ार में..
घंटियाँ भी सुनसान सी हैं
सुर बहका ले गया कोई..
सूनी सी अब घंटियाँ हैं !
सुर लौट आने के इंतज़ार में ..
लौटा दो छलिया हवाओं
खुशबु तुम वीर बुरांश की
सुर बहका ले जाने वाले
घंटिया बजने दो बुरांश की ...
बुरांश के रक्तिम क्रोध से
सघन वन पूरा सहमा हुआ !!
धीरे – धीरे पूरा सघन वन
वीर बुरांश के क्रोध से मानो...
आज फिर दावानल हुआ 


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