.

.

uttarakhandnews1.com


 शिक्षा के क्षेत्र की बहुत सी विसंगतियां आज के समय में आ गई है बहुत हैरान करने वाली हैं सरकारी स्कूल पिछड़ते जा रहे हैं। स्कूलें भयानक तरीके से वर्गीकृत हो गई हैं सबसे निचले पायदान पर हमारे सरकारी स्कूल हैं और ऐसे भी स्कूल हैं जो स्कूल कम और पांच सितारा होटल ज्यादा हैं।
आधुनिकता की अवधारणा जन्मजात भेदभाव को समाप्ति की ओर ले जाती है और लोगों को उनकी माली हैसियत के हिसाब से आगे बढाती है। हमारे प्रिय देश भारत ने अपनी अद्वितीय जाति व्यवस्था को नए सांचे में ढाल दिया है जो अलग अलग स्कूलों व हैसियत आधारित शिक्षा के सहारे अलग अलग सामाजिक जोन में ले जा रही है जो समाज को और बुरी तरह बांटता,भेदभाव करता है। इतनी विखंडित,विभाजित शिक्षा व्यवस्था किसी भी विकसित देश में नहीं है होनी भी नहीं चाहिए। सबसे बड़ी बात है कि उच्च व निम्न मध्य वर्ग के लोगों ने प्रत्येक स्तर पर सरकारी संस्थाओं से मुंह मोड़ा है चाहे स्कूल हों या हास्पिटल,ऐसी स्थिति में ये संस्थाएं सिर्फ निम्न वर्ग के लिए बनी रह जाती हैं जिनकी आवाज कभी कहीं नहीं सुनी जाती। पहले जब सरकारी स्कूल सबसे बेहतर माने जाते थे तब वहां प्रत्येक वर्ग के बच्चे जाते थे तो शिक्षा का स्तर बेहतर था। सभी वर्ग के बच्चों से एक विविध संसार निर्मित होता था जिसमें स्कूल एक "मेल्टिंग पाट"बनता था। जबकि अब वर्ग विभाजित ऊंची चहारदीवारी वाले स्कूल संकीर्ण विचारधाराओं के वाहक बन रहे हैं वहीं निम्न वर्ग के बच्चे स्कूलों में हीनभावना का शिकार हो समाज के प्रति एक विरोध से भरता है।
साथियो!इसमें कोई दो राय नहीं कि ये गैर बराबरी की शिक्षा आने वाले समय में एक सिविल वार का रास्ता प्रशस्त कर रही है। और क्यों ना? पूंजीवादी ताकतों का पहला हमला गरीब और कमजोर पर ही होता है।
क्यों ना एक समान व्यवस्था के पैरोकार बनें और उसके लिए संघर्ष किया जाय?


See More

 
Top