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खाऊं भन्ने के खाऊं, केई छई ना,
सुतुम भन्ने कहाँ सुतुम, घर छई ना.
यो व्यथा भूकम्प बनायो के खाऊं कहाँ सुतुम ....!
शब्द सीधे सीने को कोर जाते हैं सच में अपनी नेपाल यात्रा का ब्यौरा सुनाते समय गोरखा सुधार सभा की सदस्य प्रभा शाह ने जब ये शब्द बोले तो उनकी आँखें छलक पड़ी. भूकम्प प्रभावितों की दारुण व्यथा का ब्याखान करना सरल नहीं है फिर भी जिन शब्दों को ललितपुर काबरे जिले की पिछड़ी जाति तमांग की महिलायें शब्दों में ढालकर स्वरवद कर सूना रही होंगी वह दारुण शब्द ह्रदय को कोर का पीड़ा का छोया (फुहारा) फोड़कर हर अंतस में शमा रहा होगा. हे ईश्वर ऐसा न कर कि ये भोले गरीब मानुष आपसे अपना विश्वास ही उठा लें.
खैर गोरखा सुधार सभा लगभग 6 ट्रक राशन 261 घरों में बांटकर आये और बकाया आर्मी अफसर की पत्नियों की संस्था आर्मी वाइफ वेलफेयर एसोसिएशन के हवाले कर आये ताकि वे बाकी सामग्री को सही हाथों तक पहुंचा सकें.जानकारी विस्तार से खबर लगने के बाद....13 सदस्यीय गोरखा सुधार सभा की टीम कल ही नेपाल से लौटी है.


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