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झील का जल स्तर कम होने के कारण पुरानी टिहरी के भग्नावशेष दिख गए । पैर ठिठके नहीं पर अनायास ही ब्रेक पर जम गए । पुरानी यादे सामने जो आ खड़ी हो गयी एकाएक ।
अब कुछ मित्र सोचेंगे कि झील , भग्नावशेष और पुरानी यादों का लोकतंत्र और विकास की जल समाधि से क्या सम्बन्ध ?
तो पहले लोकतंत्र -
तस्वीर में जो टापू सा दिख रहा है वहां कभी राजा का निवास (राजतंत्र का केंद्र ) हुआ करता था । इससे थोड़ी दूर हुआ करती थी जेल । जिसमे श्रीदेव सुमन कैद थे (जनतांत्रिक आकांक्षाओं का केंद्र ) ।
ये वही राजा थे जिन्होंने तिलाडी में जालियांवाला बाग़ कांड दोहराया था । ये वही राजा थे जिन्होंने श्रीदेव सुमन की लाश का पता तक न चलने दिया । 
1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद देश में सिर्फ इसी तरह के राजा बच गए थे , जिन्होंने देश से गद्दारी कर अंग्रेजों का साथ दिया था ( बाकी के वंश तक नष्ट कर दिए थे ) ।
ये वही राजा थे जिन्हें कीर्तिनगर के पास नागेन्द्र सकलानी की हत्या के बाद जनता ने राज्य से भगा प्रजातंत्र की नींव रखी थी ( टिहरी रियासत 1948 में भारत में शामिल हुई थी )।
और ये वही राजा हैं जो और जिनके वंशज अब तक सत्ता (संसद - सन 52 से अब तक 8 बार ) के केंद्र में हैं।
और श्रीदेव सुमन ? आप बेहतर जानते हैं ।
लोकतंत्र की मौत और दफनाने की कथा फिर किसी दिन । फिलहाल तो जलसमाधि की सुन्दरता देखिये हुजुर । इतिहास और झील की गहराई में जायेंगे तो श्रीदेव सुमन और लोकतंत्र के अवशेष भी दिख जायेंगे ।
अब विकास-
टिहरी बाँध, एक सपना दिखाया गया विकास के नाम पर । बढ़िया शहर , बढ़िया मकान , मुआवजे की रकम से बढ़िया गाडी ,, बेशुमार बिजली ,रोजगार । और भी जाने क्या क्या । यानि खुशियाँ ही खुशियाँ । 
दीवार फिल्म के प्रसिद्द संवाद तो याद ही हैं सबको ?
-–--मेरे पास पैसा है , गाडी है , बंगला है , और तुम ? तुम्हारे पास क्या है ??
----- मेरे पास माँ है ।
माँ सिर्फ एक सजीव जैविक प्राणी नहीं है । माँ तो एक समुच्चय है - ममता ,प्रेम,उदारता ,ख़ुशी का ,परिवार की ख़ुशी के केंद्र -परिधि और विस्तार का ।
आज विकास के नाम पर बाकी सब है पर माँ नहीं ।
विस्थापन -विभाजन-पुनर्वास-मुआवजे पर टिका विकास माँ की जल समाधि दे चुका है । कुछ रिश्ते शेष हैं । वो कितने दिन बचते हैं ,पता नहीं ।


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