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यह विभाग क्यों बदनाम है यह अब समझ आता है! सोचा था अब मानक बन गए हैं तो विभागीय लेन-देन पर भी अंकुश लगेगा लेकिन यह क्या फिर वही रोकने रुकवाने के खेल में उन लोगों का स्थानान्तरण मानकों के विरुद्ध किया गया जो स्थानान्तरण के दायरे में आते ही नहीं हैं. गढ़वाल व कुमाऊ मंडल में बैठे बाबू औरअफसर यह देखने की जरुरत नहीं करते कि अध्यापकों की सेवानियमावली है क्या. बेचारे अध्यापक अब करें तो करें क्या नियमावली तो पढ़ी नहीं अतएव लाख दो लाख रुपये देकर फिर स्थानान्तरण रुकवाने की कवायद ही कर सकते हैं जबकि चतुर और चालाक बाबू पांन की पीक थूकते हुए हरे नोटों के बंडलों को गिनने के सपने देख रहे होंगे.
शिक्षा विभाग में चल रहे इस व्यापार कीपोल राज्य निर्माण से लेकर अबतलक बदस्तूर खुलती ही रहती है लेकिन कौन लगाम लगाए.
सेवानियमावली को अगर आधार बनाकर देखा जाय तो 57 बर्ष कीउम्र के बाद किसी भीअध्यापक का स्थानान्तरण नहीं किया जा सकता लेकिन विभागीय अधिकारियों और बाबुओं की मिलीभगत तो देखिये एक मासाब के सिर्फ दोमाह सेवानिवृत्ति केशेष हैंऔरउन्हेंभी स्थानान्तरण कीश्रेणी में रख दुर्गम मेंभेजा गया ऐसे लगभग दर्जन भर अध्यापक हैंजिन्हें सेवानियामावाली के विरुद्ध स्थान्नान्त्रित किया गया है. अब यह सरासर घूसखोरी की दावत नहीं तो और क्याहै.


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