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नैनीताल (प्याउ)। प्रदेश की सरकारी नौकरी में राज्य गठन आंदोलनकारियों को दस प्रतिशत आरक्षण देने के पूर्व शासनादेश को सरकार द्वारा वापस लेने की मंशा से राज्य गठन आंदोलनकारियों में आक्रोश फेल गया हें। आंदोलनकारियों का मानना है कि सरकार ने इस मामले में सरकार की नियत ठीक रहती तो वह मजबूती से इसकी पेरवी कराती और विधानसभा में इस आशय का संवैधानिक प्रावधान करती। आंदोलनकारियों को इसकी आशंका है कि सरकार में एक मजबूत तबका आंदोलनकारियों को फूटी आंख देखना नहीं चाहता। इसीलिए इस मामले को सरकार हल्के में ले रही है। वहीं सरकारी पक्ष का बचाव करते हुए राज्य आंदोलनकारी कल्याण परिषद के उपाध्यक्ष धीरेन्द्र प्रताप ने कहा कि सरकार आंदोलनकारियों को सरकारी सेवाओं में दिये गये दस प्रतिशत आरक्षण की हर हाल में रक्षा करेगी। श्री प्रताप को आशा है कि सरकार 24 जुलाई को न्यायालय में अपना पक्ष मजबूती से रखेगी। परन्तु आंदोलनकारियों को बार बार आश्वासन के बाद न्यायालय में इस मामले को मजबूती से न उठाने व विधानसभा में इस आशय का विधेयक पारित न कराने के कारण सरकार की मंशा पर ही शक नजर आ रहा है।
गौरतलब है कि सरकार द्वारा पूर्व में निकाले गये शासनादेश को भवाली निवासी महेश चंद पंत की याचिका पर उच्च न्यायालय में लम्बे समय से वाद चल रहा है। इस मामले की सुनवायी कर रहे न्यायमूर्ति आलोक सिंह व न्यायमूर्ति सुर्वेश कुमार गुप्ता की खण्डपीठ में 20 जुलाई को प्रदेश सरकार ने जो बयान दिया उससे न्यायालय ने सरकार को इस आरक्षण सम्बंधी शासनादेश को वापस लेने को कहा। इस पर न्यायालय ने 24 जुलाई को सरकार से इस आशय के दस्तावेज पेश करने को कहे। वहीं समर्पित आंदोलनकारियों का कहना है कि जब उन्होंने सरकार से इस प्रकार की किसी सुविधा या आरक्षण की मांग नहीं की थी। परन्तु जब सरकार ने यह आरक्षण दे कर आंदोलनकारियों का हितैषी होने का दंभ भर रही है तो फिर क्यों इसकी रक्षा नहीं कर रही है। यह पहला मामला नहीं है । सरकार की इतनी दिशाहीनता है कि वह अभी तक राज्य आंदोलनकारियों को ईमानदारी से चिन्हिकरण तक नहीं कर पायी। वहीं दूसरी तरफ वह सरकार द्वारा अन्यायपूर्ण मानकों के कारण किसी आंदोलनकारियों को सरकारी नौकरी या पेंशन दी जा रही है वहीं दूसरे समर्पित आंदोलनकारियों को कई बार फरियाद करने के बाद भी वंचित कर अपमानित किया जा रहा है। यही नहीं समर्पित आंदोलनकारियों को चिन्हिकरण तक नहीं किया गया। इसे सरकार में बैठे लोगों की अक्षमता व पक्षपाती कुशासन समझे या राज्य गठन आंदोलनकारियों के खिलाफ उनकी धृणा माने। परन्तु यह साफ है राज्य आंदोलनकारियों को कल्याण के नाम पर सरकार विगत 14 सालों से निरंतर अपमानित कर छल रही है।


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