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दाज्यू मत समझो हमको ऐरे गैरे 
दाज्यू हम तो ठेठ पहाड़ी जो ठैरे ।।

तुम कन्फ्यूज हो जाते हो 
पर हम गजबजी जाने वाले ठैरे 
तुम फिसल जाते हो 
पर हम घुरी जाने वाले ठैरे ।।

दाज्यू मत समझो हमको ऐरे गैरे ।।

विषम परिस्थितियों में जीना कोई हमसे सीखे 
क्योकि हम पहाड़ो में रहने वाले जो ठैरे ।।

मडुवे की रोटी कंड़ालीका साग खाकर 
हसी ख़ुशी दिन काटने वाले जो ठैरे ।।

अकेले रहना पसंद नहीं हमको दाज्यू 
हम आमा बुबु काका काकी के साथ रहने वाले जो थैरे ।।

मिनरल वाटर को हम पूछते तक नहीं दाज्यू 
हम तो नौला और धारे का पानी पीने वाले जो ठैरे।।

मैगी पिज्जा बर्गर सब बेकार लगते हैं दाज्यू ।
हम हलवा पूरी में मस्त हो जाने वाले ठैरे ।।

देशी बीट यमला पगला हम क्या जाने दाज्यू 
हम तो बेडू पाको बारमासा में थिरकने वाले जो ठैरे ।।

नाख बंद कर चलते हैं तुम्हारे शहर में दाज्यू
क्योकि हम प्रक्रति की गोद में रहने वाले जो ठैरे ।।

माना की तुम्हारे शहर की बीमारी मेरे पहाड़ को भी लग गई ।
मगर दाज्यू फिर भी रोज ताज़ी हवा और ठंडा पानी पीने वाले ठैरे ।।


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