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उत्तराखण्ड में चले वनान्दोलन जिसे सरकार ने बड़ी चालाकी से चिपको नाम दिलवाया के बाद उपजी अधकचरे और अपरिपक्व प्र्यावरणियों की की जमातों ने उत्तराखण्ड के पहाड़ पर जितने पौधे रोप दिये हैं वह एक अद्भुत रिकार्ड तो है ही। यदि रोपे गये कुल पौधों का सिर्फ दस प्रतिशत भी पेड़ बन गये होते तो मैं भी आप लोगों की तरह किसे पेड़ पर मचान लगा कर रह रहा होता।
इस तस्वीर में जो जंगल दिख रहा है वह किसी ने नही रोपा था यह जंगज स्वतह विकसित हुआ जंगल है, इस प्रकार के जंगल पूरे पहाड़ में छोटे छोटे भूभागों में जगह जगह दिख जाते हैं। ये ही वो वन हैं जिसे पहाड़ के लोग अपने मायके की तरह सम्मान देते हैं। दुर्भाज्ञ कि इन वनों पर चीड़ का अतिक्रमण करवाने की जी तोड़ साजिसें होती रही हैं और बदस्तूर हो भी रही हैं।
पहाड़ में दन पैंतीस वर्षों में पेड़ लगाने के बजटों से जो गड्डे खोदे गये हैं या खोदे जारहे हैं उन गड्डों से निकली कितनी मिट्टी बर्षा जल के साथ बह कर समुन्द्र की ओर जा चुकी है या जा रही है पर सरकार या प्र्यावरणबाज कभी बहस करने की हिम्मत नही जुटा सकते यह बात में दावे से कह रहा हूं।
पहाड़ को लेकर एक बात तो बहुत साफ है कि यहा की जमीन पौध रोपने की इजााजत कतई नही देती है। किसी भी भूभाग को कुछ वर्षों के लिये छोड़ दिया जाये तो वह भूभाग स्वतह वन में तब्दील हो जाता है यह प्रयोग हमारे पूर्वज वन छेत्रों को निश्चित अवधि के लिये देवी देवताओं के नाम चड़ाने के रूप में करते आये हैं। बीजा रोपण पहाड़ के लिये पर्याप्त वन वर्धन कार्य है पर इस कार्य में बड़े बजट का जुगाड़ सम्भव नही है। यही वजह खास है कि यह रीती कभी सोच तक पहुंचने ही नही दी गई।
वैसे वन संरक्षण व वन्यजीव संरक्षण के जन विरोधी कठोर कानूनों के रहते पहाड़ में बृक्षा रोपण के साथ जन मानष जुड़ ही नही सकता यही वजह है कि उनका हरेला उत्सव हमारी समझ में मजाक से अधिक कुछ है ही नही।
Courtesy: Ramesh Pandey


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