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पनपी पौध अन्न पानी धरा व वायु का सम्मान है हुडकिया बोल-
(मनोज इष्टवाल)
अगर पृथ्वी में किसी को सबसे ज्यादा निश्वार्थ समझा गया है तो वह है पानी जिसमें न कोई खुशब है न कोई रंग ..! और तरलता सरसता इतनी की हर किसी के गले मिलने को आतुर रहता है. लेकिन जब इसके द्वारा रचाई बसाई पृथ्वी को कोई बिनाश की ओर ले जाता है तब भी इसके सब्र का बाँध बेहद रौद्र रूप के साथ फूटता है. केदार आपदा इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है.
प्रकृति प्रदत्त अन्न जल वायु प्राण धरा को मनुष्य अपनी शर्तों पर अपने हिसाब से जीता है. जब तक पर्यावरण शुद्ध था और वैज्ञानिकी प्रयोगों की अधिकता नहीं थी तब तक मनुष्य ने उपहार स्वरुप मिले इन सभी तत्वों का उतना ही सम्मान किया जितना की होना चाहिए था. विशेषत: देवभूमि उत्तराखंड ही नहीं बल्कि हिमालयी हर भूभाग में इनका काफी सामान हुआ. 
हलजोत के साथ हल बैल धरती और अन्न की पूजा की परम्परा, पौंध के उगते ही खेतों को पाटकर उनकी मांग सजाने की परम्परा, पानी से सिंचित कर उनमें पौध रोपकर उसमें अपना माधुर्य लुटाने की कला. या फिर पुष्पित होते अन्न के स्वरुप को सौन्दर्य गीतों से आंगनों में थडिया चौम्फला झुमैलो बाजूबंद में सजानेकी कला यह मानव प्रदत्त संकार नहीं तो और क्या हैं. 
पहाड़ों पर रोपाई के समय कभी हुड्किया के गीतों के बोल और हुडके की धुंग धुंग के साथ जब मातृशक्ति खेतों के श्रृंगार के लिए अपने तन मन की ऊर्जा न्यौछावर करती थी तब लगता था की इस पानी में मिल रही उनके पसीने की नमकीन बूंदों ने बादलों की कोख खोल दी हो और फिर आसमान भी अपने सहयोग से हुड्किया के बोलों में थिरकने लगता था वह भी बारिश की फुहारों के साथ गर्मी के अंतस को कम कर खेतों मेंढो और मात्रिश्कती के श्रृंगार को उन्मत हो उठता था. आह रे प्रकृति कितना संतुलन होता था इन सब बातों में ..!
लेकिन आज हमने ये सब परम्पराएं छोड़ दी हैं. वैज्ञानिक पधत्ति से हो रही खेती में अंकुर भले ही बड़े निकल रहे हैं खेत हरे भी हों रहे हैं लेकिन खेतों में लहलहाती फसल की खुशबू से चलने वाली महक समाप्त हो गयी है. कभी देहरादून के एक घर में बन रही बासमत्ती पूरे मोहल्ले को महका देती थी लेकिन अब वह महक महानगर की सीमेंट में समा गयी है. हम जो अनुशरण चाहे लोक संस्कृति का करना छोड़ रहे हों या फिर अपनी ठेठ खेती का ..मन व पर्यावरण दोनों ही दुखी मन से हमारा सहयोग कर रहे हैं. यह सर्वार्थ सत्य है.



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