.

.

uttarakhandnews1.com




भैर ग्वला भित्तर ग्वर्ला अर्ज पुर्ज कैमा करला...!
चौन्दकोट गढ़ के थोकदार रहे गोर्ला राजपूतों की वीरता के साथ जाने कितने किससे जुड़े रहे. इन्हीं के सानिध्य में गढ़-नरेश को हरी हिन्दवाण और हंसा (आशा) हिंदवाण जैसे पराक्रमी भड़ मिले लेकिन इन्हीं के वंशजों ने कुछ निरंकुशता भी दिखाई है ..जिस से त्रस्त होकर आम जनता अपने को बेबस और लाचार समझने लगी थी. और उस पीड़ा को झेलने वाली जनता ने कहना शुरू कर दिया- भैर ग्वला भित्तर ग्वर्ला अर्ज पुर्ज कैमा करला...! यानि द्वारपाल भी गोर्ला, चपरासी भी गोर्ला, बाबू भी गोर्ला और जज भी गोर्ला तो उनके विरुद्ध सुनवाई किस से करवाएं.
हर अति का अंत होता है यही गोरला रावतों के साम्राज्य के साथ भी हुआ एक समय ऐसा भी आया कि चौन्दकोट गढ़ के गढ़पतियों का यह साम्राज्य कब भर्र-भराकर गिर गाया पता भी नहीं चला. जबकि एक समय गोर्ला थोकदार की शक्तियां इतनी बढ़ गई थी कि उसने गढ़ नरेश के चाँदपुर गढ़ की तर्ज में चौन्दकोट गढ़ की स्थापना कर डाली थी.
इन सब राजपूतों का गौरव इतिहास तब धूमिल हो गया जब चौन्दकोट के गढ़पति के घर पुत्री जन्मी जिसका नाम तीलू रौतेली रखा गया. तीलू रौतेली की शौर्य गाथा के नीचे गोर्ला थोकदारों का वजूद दबकर रह गया और यही कारण है कि वीरता की पराकाष्ठा के रूप में जाने जाने वाले एक भी गोर्ला थोकदार का जिरह स्वयं गोर्ला वंशजों के पास नहीं है जिन्होंने अपना सीमा विस्तार कुमाऊ के चंद वंशज राजाओं की सीमा छीनकार बढ़ाया था.
इसमें कोई दोहराय नहीं कि इड़ा चौन्दकोट गॉव के सिपाही नेगियों ने जिस तरह का किला अपने लिए बनाया था तल्ला इडा में आज भी वह साक्ष्य के रूप में खड़ा है जबकि पूरा गॉव सिपाही नेगी वंशजों से सूना हो गया है.
इन सिपाही नेगियों की बदौलत ही गोर्ला थोकदार ने बहुत सी लडाइयां झेली और यही कारण भी था कि इन्होने तीलू रौतेली की मंगनी सिपाही नेगियों के थोकदार के पुत्र से कर दी थी जिसकी मृत्यु कुमाऊ के राजाओं के साथ एक लड़ाई में हो गई और तभी से बाल-विधवा तीलू रौतेली ने कमान अपने हाथ में लेकर न सिर्फ वह क्षेत्र कुमाऊ के राजाओं से छीना बल्कि पूरी फ़ौज को नाकों चने भी चबवाए.
यह घर तीलू रौतेली का बताया जाता है. जिसने बाद तक कई अच्छे अफसर दिए हैं लेकिन यह घर मल्ला गुराड़ जाने के रास्ते में निर्मित है और यह ज्यादा पुराना निर्मित भी नहीं लगता ..यह बमुश्किल सौ बर्ष पुराना है. जबकि तल्ला गुराड़ में आज भी क्वाठा है जिसे लोग तीलू रौतेली का क्वाठा मानते हैं. बर्षों पहले मैंने वहां का भ्रमण किया था और वह अंधेर गुफ़ा की जेल भी देखि थी जहाँ हैडहिन्गोड़ पर दुर्दांत कैदियों को बाँधा जाता था वह हैडहिंगोड आज भी है कि नहीं कह नहीं सकता. फिलहाल हमें इतिहास के कई सुनहरे वो पन्ने तलाशने होंगे जिन्हें ब्रिटिश गढ़वाल में शासन करने के दौरान अंग्रेज मिटा चुके हैं. अब इन गढ़ के अवशेषों को कौन संगृहीत करे यह सोचने वाली बात है. क्या यह कर्तब्य गोर्ला थोकदार या सिपाही नेगी थोकदारों के वंशजो का नहीं है कि वे अपनी पुरखों की शौर्य गाथा को सम्भालकर रखने के लिए एक जुट हों.
फोटो आभार-कविन्द्र इष्टवाल-1
फोटो-मनोज इष्टवाल -2 इडा गॉव के किले का एक हिस्सा


See More

 
Top