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मुझे याद है जब गीतकार लेखक संगीतकार व गायक गणेश वीरान ने प्यारी छुमा फिल्म की पटकथा लिखी व उसकी शूटिंग शुरू हुई तो कई गंदर्भ जाति के वान्शानुक्रमियों ने खूब हंगामा काटा उनका कहना था कि इसमें उनकी जाति के ऊपर प्रहार है. खैर फिल्म विवादों के कारण परदे पर तो न आ सकी लेकिन उसकी ऑडियो कैसेट सुपरहिट हुई जिसमें "तेरु बकिबात रूप कमयूँ छ..त्वेमा सैरु गढ़वाल समयुं छ" गीत सबसे ज्यादा सुप्रसिद्ध व बादियुं की नौनी छुमा हे बोल रै जाणा तेरु झम, विवाद की जड़ रही.

आज यदा-कदा इस जाति के कुछ ही बिरले लोग जो टिहरी ख़ास पट्टी या उसके आस-पास हैं इस पेशे में हैं बाकी ने लगभग यह कार्य छोड़ दिया है. आखिर छोड़ें भी तो क्यों नहीं एक तो उपेक्षा के शिकार रहे ऊपर से हर एक व्यक्ति शिक्षित समाज में रहकर चाँद तारे तोड़ने को तैयार बैठा है फिर वह समाज क्यों नहीं जिसकी हम तथाकथित सवर्णों ने हमेशा उपेक्षा ही की.

रुद्रप्रयाग टिहरी चमोली पौड़ी उत्तरकाशी व देहरादून के जौनसार बावर क्षेत्र में फैले इस जाति के लोगों ने लाँघ में चढ़कर खंड बाजे कह-कह कर पूरे मुल्क की खुशहाली की प्रार्थना ही की. आपकी शादी ब्याह हर शुभ कार्य में राधाखंडी गायन से आपके व मेहमानों के यशगान की कई गाथाएं गाई सच कहें तो इन्हीं के बोलों में सजी कई पीढ़ियों का इतिहास हमारे लिए आज भी प्रेरणाप्रद है.

चाहे दुगड़डा क्षेत्र का रंडी बाजार रहा हो या फिर पहाड़ों के सुदूर अंचलों तक फैले गंदर्भो के कई गॉव ..! यह जाति पेशे के साथ साथ काफी स्वच्छता पसंद भी रही है.

बादी जाति के संरक्षण हेतु हमें संस्कृति विभाग से इनके संरक्षण और संवर्धन हेतु ऐसी योजना क्रियान्वयन करवानी चाहे ताकि यह जाति अनंत काल तक हमारा यूँही मार्ग दर्शन करती रहे रिधि-सीधी देती रहे..
मनोज इस्तवाल



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