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पौड़ी गढ़वाल के चौन्दकोट क्षेत्र के पौराणिक सिख और उनके गुरुद्वारे...! 
मुझे उस समय बड़ा ताजुब हुआ जब में "ब्रिटिश गढ़वाल के इतिहास में थोकदारों की भूमिका" नामक अपनी पुस्तक के लिए शोध कार्य हेतु गॉव गॉव भटक रहा था.. आश्चर्य इस बात का हुआ कि अपने गढ़वाल में बिन पगड़ी के सिख हैं और उनके गुरुद्वारे भी जिनकी रिश्तेदारी गढ़वाल की सभी अन्य राजपूत जातियों से होती है.
हमारे पुरखों के गॉव नौखंडी की धार में बसा सिख नेगियों का यह गॉव पीपली जिसकी फोटो निम्नवत है, मेरे लिए उस उम्र में हैरत का विषय बना जब मैं अच्छा ख़ासा बांका जवान था. मैं जब पहली बार अपने पुरखों के गॉव गया जहाँ से हमारे झड़ दादा पलायन कर पहले इसोटी, फिर कुलाणी फिर डोबल्या और अंत में उनके पौते धारकोट बसे. तो वहां गिरधारी लाल इष्टवाल ताऊजी से मुलाक़ात हुई जो जितने बड़े शिल्पी थे उतने ही ज्यादा जानकार भी ! तब उन्ही ने सिखों की ब्रिटिश गढ़वाल में उपस्थिति की जानकारी देते हुए कहा कि जब गुरुनानक गढ़वाल भ्रमण पर आये तब यहाँ गोर्ला थोकदार यानी कि तीलू रौतेली के दादा जी ने उन्हें अपने इलाके में शरण दी व उनके साथ आये कई सिख लड़ाकू अपने परिवार सहित यहीं बस गए जिनमें पीपली गॉव (पीपल के पेड़ के नीचे गुरुनानक बैठे थे) में सर्व प्रथम सिख नेगी बसे तदोपरांत रीठाखाल में उन्होंने अपना कई साल प्रवास रखा जहाँ उनके शत से आज भी मीठा रीठे का पेड़ मौजूद है उनके अनुयायी यहाँ भी हलुणी गॉव बसे. इसके अलावा कुर्ख्याल सहित दो तीन अन्य गॉव चौन्दकोट के हैं जहाँ आज भी सिख नेगियों के गुरुद्वारे हैं. ये सब आज गढ़वाली समाज के रीति रिवाजों में रच बस गए हैं लेकिन फिर भी ये गुरु-महाराज का ध्वज बुलंद किये हुए हैं.
रीठाखाल के पास पाळी गॉव की गोद में बसा एक और छोटा गॉव है वहां भी सिख धरम का गुरुद्वारा है. ये गुरुद्वारा भले ही छोटे हों लेकिन इनकी बनावट बिलकुल अन्य गुरुद्वारों की तरह है.


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