.

.

uttarakhandnews1.com



तिवारी व खण्डूडी सरकारों की उत्तराखण्ड विरोधी मूकता के कारण थोपे गये जनसंख्या पर आधारित विधानसभाई परिसीमन में अविलम्ब सुधार करे सरकार
उत्तराखण्ड के हितों पर कुठाराघात करने वाले नेतृत्व के कारण अन्यायपूर्ण तरीके से हुई विधानसभाई परिसीमन को बदलने की नितांत जरूरत
उत्तराखण्ड की वर्तमान हरीश रावत सरकार ने जिस सबसे महत्वपूर्ण जम्मीदोज हो चूके मुद्दों में से एक गंभीर समस्या को सकारात्मक हवा दी वह है प्रदेश में उत्तराखण्ड राज्य गठन की मूल अवधारणा को जमीदोज करने वाला जनसंख्या पर आधारित विधानसभाई परिसीमन। प्रदेश के वर्तमान ही नहीं भविष्य पर विनाशकारी कुठाराघात करने वाला परिसीमन प्रदेश में थोपा गया पूर्व मुख्यमंत्री तिवारी व खण्डूडी जी द्वारा इस को प्रदेश में ना लागू करने के लिए झारखण्ड व पूर्वोत्तर के राज्यों की तरह पुरजोर विराध न किये जाने के कारण। गैरसैंण में विधानसभा भवन का निर्माण करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल करने के बाद विधानसभाई विधानसभा क्षेत्रों के इस अन्यायकारी परिसीमन के तहत हुए निर्धारण में सुधार करने की मंशा जाहिर करना प्रदेश के वर्तमान व भविष्य की रक्षा के लिए बहुत बडा काम है। जिस प्रकार से रणनीति के तहत प्रदेश के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने संगठन व सरकार दोनों तरफ से इस मांग को उठाने का काम किया वह अत्यावश्यक है। नहीं तो यह मामला आम जनता तो रहा दूर प्रदेश के भाग्यविद्याता समझे जाने वाले जनप्रतिनिधियों के जेहन तक नहीं है। अब सरकार को चाहिए कि इस मामले में जनता का जागरूक करने के साथ तत्काल इसके लिए सभी दलों को साथ में लेकर इस भयंकर भूल को सुधार करने का ठोस काम करें। भाजपा सहित तमाम राजनैतिक दलों से भी यही आशा है कि प्रदेश के भविष्य निर्माण के प्रति अपने दायित्वों का निर्वाह करते हुए वे ऐसे मूल मुद्दों पर मैदान व पर्वतीय की हवा दे कर औछी राजनीति नहीं करेगें। 
नक्कारे, पदलोलुपु, अक्षम व जनविरोधी नेतृत्व का खमियाजा देश, प्रदेश व समाज का वर्तमान में ही नहीं अपितु भविष्य में पीढ़ी दर पीढी में भी भोगना पडता है। इसका एक सबसे ज्वलंत उदाहरण है देश में हुए विधानसभाई क्षेत्रों का जनसंख्या के आधार पर हुआ परिसीमन। जिस राज्य का गठन ही मैदानी भागों से हटकर अलग विषम भौगोलिक स्थिति के कारण हुआ हो। वहां के तत्कालीन नेतृत्व तिवारी व खण्डूडी ने अपने कार्यकाल में इसका पुरजोर विरोध न करके इसको प्रदेश में भी मेदानी राज्यों की सोच पर बने नियम को थोप कर राज्य गठन की अवधारणा पर ही घोर कुठाराघात कर दिया। अब प्रदेश के मुख्यमंत्री ने पूर्व में की गयी भूल को सुधारने का मन बनाया तो उसका स्वागत होना चाहिए। उस समय न केवल प्यारा उत्तराखण्ड समाचार पत्र में अपितु राज्य आंदोलनकारी संगठनों की तरफ से मेने इसका पुरजोर विरोध किया था। राज्य गठन आंदोलनकारी संगठनों ने हर मंच पर इसे प्रमुखता से उठाया था। परन्तु क्या मजाल है प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी व उसके बाद भाजपा के शासनकाल में मुख्यमंत्री रहे भुवनचंद खण्डूडी के कान में जूं तक नहीं रेंगी। जबकि इस कानून को न केवल पूर्वोत्तर के चार राज्यों के प्रबल विरोध के बाद अपने यहां लागू नहीं किया वहीं उत्तराखण्ड के साथ नये राज्य बने झारखण्ड ने भी इसका पुरजोर विरोध कर इसको लागू नहीं किया। परन्तु उत्तराखण्ड विरोधी, अक्षम, अदूरदर्शी व नक्कारे नेतृत्व होने के कारण यहां पर उत्तराखण्ड राज्य गठन की मांग करने वाले पर्वतीय क्षेत्र की राजनैतिक शक्ति व भविष्य पर कुठाराघात हो गया। पर्वतीय क्षेत्रों की 6 विधानसभा सीटें इस नियम से हुए परिसीमन में कम हो गयी। यह यहीं पर नहीं रूकेगा। यह नजीर बन गया आने वाले समय में जब भी दस या बीस-तीस सालों में फिर जनसंख्या के आधार पर विधानसभाई क्षेत्रों का परिसीमन होगा तो पर्वतीय क्षेत्र की विधानसभायें इसी प्रकार से लगातार कम होती रहेगी। जब विधायकों की संख्या ही कम होगी तो उत्तराखण्ड की उस अवधारणा जिसके लिए राज्य का गठन उप्र से अलग होने के लिए किया था उसको लागू करने वाली ताकत व समझने वाली ताकत दोनो कमजोर रहेगी तो वह साकार कहां से होगा। 
यहां सवाल मैदान व शहर का नहीं है। यहां सवाल यह है कि जब प्रदेश का गठन ही विषम भौगोलिक स्थिति को लेकर किया गया हो। जब प्रदेश में पंचायतों का परिसीमन ही भौगोलिक परिस्थितियों को देख कर मैदानी क्षेत्रों के हिसाब से अलग किया गया हो। तो चंद साल पहले ही विधानसभाओं का निर्धारण व राज्य के गठन होने पर यहां के अक्षम नेतृत्व ने इस अन्यायपूर्ण परिसीमन को यहां नहीं रोका। जब लोकसभाई क्षेत्रों को जनसंख्या के आधार पर बढाये जाने की दक्षिण राज्यों के विरोध के बाद रोका गया तो क्यों उत्तराखण्ड के तत्कालीन नेतृत्व ने यह मांग नहीं उठाई। ऐसे नक्कारे व पदलोलुपु नेताओं को उत्तराखण्ड की जनता से माफी मांगनी चाहिए और सरकार के इस कार्य में सहयोग करना चाहिए। 
लोकसभाई सीटों का जनसंख्या के आधार पर बढ़ोतरी अभी नहीं हो सकती है। न ही यह प्रदेश सरकार के अधिकार क्षेत्र में है। परन्तु अन्यायपूर्ण हुए जनसंख्या के आधार पर विधानसभाई क्षेत्रों का पुन्न परिसीमन तो किया जा सकता है। भले ही विधानसभा की सीटों की संख्या न भी बढाये जाय। पर प्रदेश के हितों के प्रति जनता के दिलो व दिमाग में सही बात तो विद्यमान रहनी चाहिए। यही काम नेतृत्व का होता है। नहीं तो दलगत राजनीति के कारण प्रदेश के दूरगामी हितों को किस कदर रौंदा गया यह राज्य गठन के 15 साल के इतिहास पर एक नजर दौडाने से साफ दृष्टिगोचार होता है। किस प्रकार प्रदेश की सर्व सम्मति व सरकार द्वारा राज्य गठन से पहले ही तय की गयी राजधानी गैरसैंण को लटकाने का षडयंत्र इन सरकारों ने अपने कार्यकाल में किया। लोगों को इसका भान भी नहीं रहा कि जिनको वे अपना भाग्यविधाता रहनुमा बता रहे हैं वे ही उनके वर्तमान व भविष्य को रौंद रहे है। मुजफरनगर काण्ड के दोषियों को किस प्रकार से दण्डित किया जाना अत्यावश्यक है यहां के पदलोलुपु नेताओं को अभी तक इसका अहसास तक नहीं है। इस दिशा में वे काम करने की जरूरत तक महसूस नहीं करते। उल्टा इन काण्ड के गुनाहगारों को संरक्षण दिया गया। ये ही भूल नहीं मूल निवास प्रमाण पत्र में नेतृत्व की कमी के कारण यहां मनमाना नियम बनाया गया। वहीं झारखण्ड के प्रदेश के हितों के प्रति जागरूक नेतृत्व ने वहां के मूल निवास की सही नियम बनाया। हिमाचल की तर्ज पर भू कानूनों को बना कर प्रदेश में माफियाओं से बचाने में प्रदेश का नेतृत्व न केवल अक्षम रहा अपितु प्रदेश में भ्रष्टाचार, बेलगाम नौकरशाही व दिशाहीन जनप्रतिनिधियों पर अंकुश लगाने में अब तक की तमाम सरकारें असफल रही है। प्रदेश की विकासोनुमुख दिशा तक तय करने में सरकारें असफल रही। वहीं प्रदेश के तंत्र को मजबूत व सक्षम बनाने वाले संवेंधानिक संस्थानों में प्रतिभावान व साफ छवि के लोगों के हाथ में बागडोर देने के बजाय दागदार व अक्षम प्यादों को थोप कर यहां के अब तक के नेतृत्व ने प्रदेश की पूरी व्यवस्था को पंगू कर दिया है। जनता को आशा थी कि हरीश रावत मुख्यमंत्री बन कर प्रदेश को सही दिशा में ले जायेगे। अन्य आशाओं पर हरीश रावत ने भले ही निराश किया पर गैरसैंण व अब परिसीमन के मुद्दों को हवा दे का सराहनीय कार्य किया।जब यहां के नेतृत्व को प्रदेश के हितों का भान ही नहीं रहेगा तो वह काम कहां से करेगा। वह प्रदेश के संसाधनों व राज्य निर्माण के महत्वपूर्ण समय को अपनी पदलोलुपुता की भैंट चढ़ाने के अलावा दूसरा क्या करेगा। इसी कारण प्रदेश में जड़ता,व भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है। चारों तरफ व्यवस्था को दोनों हाथों से लूटने की अंध प्रतियोगिताये चल रही है। बेलगाम नौकरशाही के कारण पूरा तंत्र प्रदेश के विकास के बजाय प्रदेश को पतन के गर्त में धकेलने वाला बन गया है। आशा है वे इन दोनों मुद्दों को हल करके प्रदेश की आशाओं पर खरा उतरेगे व अपने दायित्व का निर्वाह करेंगे। 


See More

 
Top