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ये कविता उन लोगों को समर्पित जो हर काम में और हर हाल में बस मीन-मेख निकालते ही रहते हैं-----
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जादा .कहना. नहीं. है. ठीक,
कुछ दिन तो चुप रहना सीख
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खालीबर्तन की आवाजें
बेकाबू शोर मचाती हैं,
,जिसमें हो द्रब्य भरा उसमें
आवाज बहुत कम आती है
अब तू ही बता दे क्या है ठीक
,कुछ दिन तो चुप रहना सीख
जादा कहना------------------
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,खोटा ही जादा रजता है,
,थोथा ही जादा बजता है,
तू बेहतर है तो ,जग को सिखा,
कहने से बेहत्तर करके दिखा
फिर स्वतः झुकेगा सबका शीष
कुछ दिन तो चुप रहना सीख
,जादा कहना-----------------
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ये घोर घमंड की बात है क्या
,तेरी जग में सौगात है क्या
,इतना विश्व भूगोल बडा
,इसमें तेरी औकात है क्या
क्यों हरदम हर से रखता रीश
कुछ दिन तो चुप रहना सीख
,जादा कहना----------------
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तू सब में सब सर्वस्व नहीं,
,जीवन का अन्तिम तत्व नही
,तू सूर्य से बडकर नहि नभ में,
,तुझ से भी बेहत्तर हैं जग में
,,तू खाली उछल रहा क्यों बीच 
कुछ दिन तो चुप रहना सीख
जादा कहना------------------
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, धरती जग तपती रहती है,
,फिर भी वो कुछ नहिं कहती है
आकाश तो आसय देता है
,पर कब किसको क्या कहता है 
,,तू इनसे सीख बना दे लीक.
,कुछ दिन तो चुप रहना सीख
जादा कहना------------------
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,एक बार कहने वाला
डंके की चोट पे कहता है,
,जो बार-बार बजता है वो,
पग घुगरू बन के रहता है,
यूं बजना छोड दे मेरे मीत,
कुछ दिन तो चुप रहना सीख 
जादा कहना-----------------
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पानी से तृप्त भरे बादल
कब इतना शोर मचाते हैं,
,जल से जो शून्य समूचे हों,
वो जीवन गगन डराते हैं ,
अब छोड दे हल्के मन की रीत
कुछ दिन तो चुप रहना सीख,
जादा कहना-----------------
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,तू,खाली विषधर बनता क्यों
,पग-पग पर जहर उगलता क्यों 
,पर निन्दा कर्म कुटिलता में,,
निज इतना रग बदलता क्यों ,
,कोई कुचल न दे तेरा फन सा शीष,
,,कुछ दिन तो चुप रहना सीख
जादा कहना

Jagdamba Chamola


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