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देहरादून  : 9 अगस्त, 2015

उत्तराखंड की जैव विविधता बचाने के लिए सरकार हाय-तौबा मचाए रहती है। साथ ही केंद्र सरकार की नमामि गंगे, निर्मल गंगा समेत कई योजनाएं ऐसी हैं, जिनमें जैव विविधता पर सबसे अधिक जोर रहता है।

राज्य सरकार खुद जैव विविधता के लिए योजनाएं बनाने का दावा करती है, लेकिन कड़ुवी हकीकत यह है कि राज्य सरकार का वन विभाग आज तक जैव विविधता बोर्ड की नियमावली ही नहीं बना पाया है। ऐसे में बिना नियमों के जैव विविधता सहेजने के लिए कोई काम होना संभव ही नहीं है।

हालत यह है कि प्रदेश सरकार के आला कमान अफसरों को भी यह पता नहीं कि जैव विविधता बोर्ड की नियमावली नहीं बनी है। ‘आओ मनाएं हरेला’ अभियान के दौरान अपर मुख्य सचिव एस. राजू ने पिछले माह जैव विविधता बोर्ड की बैठक बुलाई, लेकिन जब पता चला कि नियमावली ही नहीं है तो बैठक निरस्त कर दी गई।

इतना ही नहीं पर्यावरण संरक्षण से जुड़ीं कई अर्द्ध सरकारी एजेंसियों से बोर्ड को मिलने वाला फंड भी प्रभावित हो रहा है। रूटीन में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से मिलने वाला पैसा राज्य को मिलता जरूर है, लेकिन यह कैसे और कहां खर्च होता है, किसी को पता नहीं।

केंद्र सरकार ने जैव विविधता बोर्ड के संबंध में वर्ष 2002 में अधिनियम बनाया था। उसके बाद वर्ष 2004 से उत्तराखंड में जैव विविधता बोर्ड की नियमावली पर काम हो रहा है।

राष्ट्रीय जैव विविधता बोर्ड के बार-बार पूछने पर वन विभाग ने कागजी काम दिखाना शुरू कर दिया। न्याय पंचायत स्तर पर जैव विविधता समितियां बनाने का भी दावा किया गया, लेकिन जब नियमावली ही नहीं है तो काम कैसे हो पाएगा।

यह है बोर्ड
- जैव विविधता बोर्ड का चेयरमैन-कोई पर्यावरणविद्, राजनीतिज्ञ, वन विभाग का सेवानिवृत्त अफसर बन सकता है
- सदस्य सचिव इस पद पर मुख्य वन संरक्षक स्तर के ऊपर का अधिकारी बनेगा
- पांच सदस्य होंगे, जो जैव विविधता से संबंधित विभिन्न क्षेत्रों के हो सकते हैं
- सेलेक्शन कमेटी का अध्यक्ष वन मंत्री को बनाया जाएगा
- सर्च कमेटी अध्यक्ष शासन का मुख्य सचिव होगा

जैव विविधता बोर्ड की नियमावली तैयार हो रही है, बहुत जल्द इस संबंध में कार्य पूरा हो जाएगा। बीते माह विधायी विभाग को इसे भेज दिया गया है।
- डॉ. रणबीर सिंह, प्रमुख सचिव, वन एवं पर्यावरण
Courtesy: अमर उजाला


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