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#uttarakhandnews:  शाहिद को मोहरा बना कर उत्तराखण्ड की कांग्रेसी सरकार को ढाह पायेंगे क्या मोदी!
कौन जीतेगा सत्ता की यह जंग-‘केदारनाथ की सेवा करने वाले हरीश रावत या केदारनाथ की उपेक्षा करने वाले प्रधानमंत्री मोदी!
केन्द्र सरकार ने शाहिद को तत्काल वापस बुलाया, दूसरी तरफ प्रदेश भाजपा नेता मिले राज्यपाल से
भले ही अपने राजनैतिक कौशल के बल पर मुख्यमंत्री हरीश रावत, भाजपा द्वारा सीडी प्रकरण के सहारे अपनी सरकार को अपदस्थ करने के षडयंत्र की हवा उडाते हुए कहे कि भाजपाई सीडी सीडी चिल्लाते रहेंगे और हम सीटी बजा कर सीडी चढ़ जायेंगे। परन्तु लगता है मोदी सरकार ने देश से कांग्रेसी सरकारों से मुक्त करने के संकल्प को पूरा करने के लिए कमर कस दी है। मोदी सरकार ने अपने अभियान को परवान चढ़ाते हुए अपने सचिव के स्टिंग प्रकरण में घिरे उत्तराखण्ड की कांग्रेसी सरकार के मुखिया हरीश रावत की चैतरफा मोर्चाबंदी कर दी है। इसके तहत एक तरफ उत्तराखण्ड भाजपा ने शराब व्यापार प्रकरण पर मुख्यमंत्री के सचिव शाहिद के स्टिंग आप्रेशन के बाद मुख्यमंत्री को जिम्मेदार मानते हुए प्रदेश सरकार की बर्खास्तगी की मांग को लेकर प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत व नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट के नेतृत्व में 10 जुलाई को राज्यपाल से मिला वहीं दूसरी तरफ 10 जुलाई को ही इस स्टिंग आप्रेशन में विवादों के घेरे में आये मुख्यमंत्री हरीश रावत के सचिव मोहम्मद शाहिद को कडा पत्र भेज कर तत्काल केन्द्र में अपनी सेवा में जुड़ने का आदेश दे कर गुजरात केडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी शाहिद को जांच के नाम पर उत्तराखण्ड में ही बनाये रखने की रणनीति पर बज्रपात कर दिया।
राजनीति में धुरंधर मुख्यमंत्री हरीश रावत बखूबी से जानते हैं कि केन्द्र सरकार इस स्टिंग में फंसे अधिकारी को दवाब में लेकर उनके खिलाफ मोहरा बना सकती है। इसी रणनीति को भांपते हुए मुख्यमंत्री हरीश रावत ने जांच तक इस अधिकारी को उत्तराखण्ड में ही बनाये रखने का प्रशासनिक दाव पेच चला था। केन्द्र सरकार ने इसी कमजोर कड़ी पर हाथ रखते हुए शाहिद की प्रतिनियुक्ति को निरस्त कर उन्हें तत्काल अपनी केन्द्रीय सेवा से जुड़ने का कड़ा फरमान दिया। इस फरमान के बाद उत्तराखण्ड सरकार ऊहापोह की स्थिति में है।
उल्लेखनिय है भाजपा किस कदर प्रदेश की सरकार को अपदस्थ करने का कोई मौका हाथ से नहीं छोड़ना चाहती है। इसी के तहत बहुत ही सोची समझी रणनीति के तहत अशोक पाण्डे द्वारा बनायी गयी इस स्टिंग की सीडी को 22 जुलाई को भाजपा की केन्द्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण ने दिल्ली में प्रेसवार्ता में जारी किया।
क्योंकि भाजपा को मालुम था कि अगर अशोक पाण्डे इसको देहरादून या दिल्ली में जारी करेंगे तो राजनीति के मंझे हुए नेता हरीश रावत का इतने प्रभावशाली है कि यह खबर दम तोड़ कर रह जायेगी। भाजपा की आशंका निर्मूल नहीं है। इसी सप्ताह जब दिल्ली में अशोक शर्मा ने स्वतंत्र रूप से पत्रकार वार्ता की तो इसमें बडी संख्या में पत्रकार आने के बाबजूद इस वार्ता की खबर ना के बराबर छपने व देखने में आयी।
भाजपा द्वारा दिल्ली में इस प्रकरण को प्रमुखता से उठाये जाने से न केवल उत्तराखण्ड की राजनीति में भूकम्प आ गया अपितु राष्ट्रीय स्तर पर मोदी सरकार के तीन मंत्रियों के इस्तीफे मांग रही कांग्रेस असहज स्थिति में फंस गयी। इसी कारण मुख्यमंत्री को 24 जुलाई को शाहिद की इच्छा पर उनको कार्यमुक्त किया गया। केन्द्र सरकार ने शाहिद की प्रतिनियुक्ति रद्द की जिसे 28 जुलाई को राज्य सरकार ने जांच के नाम पर इसको यहां बनाये रखने के लिए पुनर्विचार करने की गुहार लगायी। परन्तु कांग्रेस को केन्द्र से अपदस्थ करने के बाद प्रदेशों से भी रही सही कांग्रेसी सरकारों को हर हाल में गिराने की रणनीति के तहत मोदी नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने 10 अगस्त को पत्र भेजकर 11 अगस्त तक शाहिद को वापस भेजने का कड़ा फरमान सुना दिया। सुत्रांें के अनुसार भाजपा सरकार शाहिद को मुख्यमंत्री के खिलाफ एक मोहरे की तरह चलने के लिए उनके पिछले कार्यकाल को भी खंगाला जा रहा है। क्योंकि भाजपा जानती है कि शाहिद मुख्यमंत्री हरीश रावत के साथ लम्बे समय से है। इस सीडी प्रकरण में भी उनके फंसने से न केवल मुख्यमंत्री हरीश रावत जहां सीधे विपक्ष के निशाने पर है वहीं मुख्यमंत्री के करीबी सिपाहेसलार भी इसी सीड़ी की पाश में घेरे में घिरे हुए है। इसलिए इस शाहिद को तुरप का पता मान कर भाजपा हरीश रावत को पदच्युत करना चाहती है। क्योंकि यह बात भाजपा आला नेतृत्व को भी भली भांति मालुम है कि इसके बीना चुनावी समर में हरीश रावत के नेतृत्व वाली कांग्रेस को मात देना भाजपा के प्रदेश के कमजोर नेतृत्व व संगठन के बूते की बात नहीं है। इसके साथ भाजपा यह भी भली भांति जानती है कि अगर हरीश रावत इन तमाम झंझावतों के बाबजूद अगर मुख्यमंत्री के पद पर विधानसभा चुनाव तक बने रहे तो भाजपा को उत्तराखण्ड में कमल खिलाना बेहद कठिन होगा। क्योंकि भाजपा के पास महाराज को छोड़ कर कोई ऐसा नेता नहीं है जो पूरी मजबूती से हरीश रावत को टक्कर दे सकता है। परन्तु महाराज का साथ भाजपा के गुटबाज नेता देंगे नहीं। इसके साथ भाजपा से प्रदेश के लोग इस बात के लिए भी काफी नाराज है कि पांचों सांसद विजयी बनाने के बाद भी भाजपा ने किसी भी नेता को केन्द्र सरकार में महत्वपूर्ण पद सरकार व संगठन में नहीं दिया। यही नहीं प्रधानमंत्री बनने के बाद विदेशों के कई चक्कर काट चूके मोदी ने अपनी सरकार के एक साल के कार्यकाल के बाद भी त्रासदी के मर्माहित केदारनाथ की की जिस प्रकार उपेक्षा की उससे उत्तराखण्ड के लोग बेहद आहत है। न तो केदानाथ नवनिर्माण के लिए कोई विशेष साहयता दी व नहीं भगवान शिव के दर्शन तक करने केदाारनाथ गये। वहीं दूसरी तरफ भले ही राहत कार्यो में हुए भ्रष्टाचार का टिकरा कांग्रेस सरकार के सर फूटना तय है परन्तु जिस प्रकार से मुख्यमंत्री हरीश रावत ने त्रासदी से तहत नहस हो चूके केदानाथ धाम व यात्रा को नियत समय पर प्रारम्भ करने में युद्धस्तर पर कार्य किया उससे लोग हरीश रावत से नाखुश नहीं है। परन्तु उनके सिपाहेसलारों के कारनामों व नौकरशाही पर अंकुश न लगाये जाने से लोग निराश है।
अब देखना यह है कि देवभूमि में इस सत्ता संघर्ष में मुख्यमंत्री बनने के बाद भगवान केदारनाथ की सेवा में जुटे शिवभक्त हरीश रावत को विजयश्री मिलती है या प्रधानमंत्री बनने के बाद भगवान केदारनाथ की उपेक्षा करने वाले प्रधानमंत्री मोदी को।
देवसिंह रावत


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