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#uttarakhandnews

कई बार हम उसी का अनुशरण कर लेते हैं जिसका न आदि है न अंत..! मैंने गोल्जू पर लिखे गए साहित्य को विस्तार से पढ़ा तो पाया किताबों में धौली -धुमाकोट पिथौरागढ़ में बताया गया.फिर ध्यान आया कि पिथौरागढ़ में धौली गंगा कहाँ से आ गई. फिर शोध किया उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल के धुमाकोट जा पहुंचा वहां धौली दूर दूर तक नहीं है. न उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल के इतिहास में धौली धुमाकोट कोई राज रहा है.
कुमाऊ के इतिहास में भी झलराई और न ही हळराई का कहीं वर्णन है...हाँ पुराणों में शायद इसका कहीं वर्णन अवश्य मिलता है. अब नामों के हिसाब से भी झलराई या हळराई शब्द में कुमाउनी या गढ़वाली का आभास कम और नेपाली होने का पूरा प्रमाण है.
कुमाऊ अल्मोडा जिले में शोध के दौरान मुझे पता लगा कि दन्या नामक गॉव में कोई इसकी जागर को जानता है. मैं ऊँघता सून्गता वहां भी पहुँच गया वहां नैन नाथ रावल ने जब गोल्जू की जागर सुनाई तो वृत्तांत से साफ़ हो गया कि काली कुमाऊ के पार बैतडी के छाल धवली धूमागढ़ के राजा झलराई और हलराई हुए.
फिर ज्ञात हुआ कि धूमागढ़ और धूमाकोट में क्या अंतर है. गढ़ = किला और कोट=किला यानी गढ़ नेपाल में और कोट कुमाऊ में बोला जाता है.
विश्वस्त जानकारी अब यह मिली है कि आज भी उस क्षेत्र के गॉव में राई, मगर, तमांग जाति के लोग निवास करते हैं जो काली नदी पार है. इस से यह प्रमाण पुख्ता हो जाता है कि यहीं काठ के बक्से में बंद कर गोल्जू को बहाया गया होगा जिसे चम्पावत में किसी मछुवारे ने बाहर निकाला और गोल्जू चम्पावत में राजा बने.
शोध की अभी नितांत आवश्यकता है, कार्य निरंतर जारी है. किसी शोधकर्ता या बुद्धिजीवी के पास गोल्जू से सम्बंधित कोई और जानकारी हो तो कृपया मार्ग दर्शन करें क्योंकि पिथौरागढ़ जिले में न धौली नदी बहती है न धुमाकोट ही कोई स्थान है. कालान्तर में अगर ऐसा कोई नाम उभरकर आया हो तो कृपया मार्गदर्शन करें. Manoj Istwal


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