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देहरादून : 30 सितम्बर , 2015

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में श्राद्घ के इस पावन मौसम में ‌बेटियां भी पितरों का श्राद्घ कर ऋण उतार रही हैं।

दून में डालनवाला के दयानंद महिला प्रशिक्षण महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. आरती दीक्षित पिछले कई सालों से अपने पूर्वजों का श्राद्ध करती आ रही हैं। आरती (51) ने माता-पिता की सेवा के लिए शादी नहीं की।

उनके दो भाई भी हैं। माता-पिता के साथ रहती हैं। आरती का कहना है कि कुंवारी होने केकारण समाज उन्हें श्राद्ध की अनुमति नहीं देता, लेकिन उनके लिए यह मायने नहीं रखता। वह अपने नाना-नानी, तीन मौसियों सहित दादा-दादी का श्राद्ध करती हैं। इससे उन्हें आत्मिक शांति मिलती है।


पिता का अंतिम संस्‍कार और श्राद्घ करती हैं नेहा

इसी तरह दून में ही लक्खीबाग की 24 साल की नेहा शर्मा के पिता ऑटो चालक थे और चार साल पहले हार्ट अटैक से उनकी मौत हो गई। नेहा ने ही पिता का अंतिम संस्कार किया था और अब श्राद्ध करती हैं।

भले ही जमाना कुंवारी कन्या को माता-पिता के श्राद्ध और अंतिम संस्कार को बहस या विवाद का विषय मानता हो, लेकिन देहरादून में ऐसी अनेक बेटियां हैं जो कर्मकांड के साथ पितरों का श्राद्ध करती हैं। उनकी नजर में श्राद्ध उनके मन का श्रद्धा भाव है।

धार्मिक विषयों के विद्वान भी कहते हैं कि यह शास्त्र सम्मत है। हेमाद्रि ऋषि ने भी पुत्री को श्राद्ध का अधिकार दिए जाने संबंधी श्लोक लिखे हैं। ‘पत्न्याभावे विभक्ता संसृष्टस्य कन्या पिण्डदा धनहारिणी च’ अर्थात् कन्या श्राद्ध कर्म एवं पिंडदान कर सकती है। 
- आचार्य भरत राम तिवारी, पूर्व उपाध्यक्ष, उत्तराखंड विद्वत सभा

पुत्र पौत्रा: अभावे पति: तदभावे दुहिता तदभावे दौहित्र। पुत्र-पौत्र के अभाव में पति, उसके अभाव में कन्या, कन्या के अभाव में बेटी का पुत्र पिंडदान, दाह संस्कार और श्राद्ध कर सकता है। शास्त्रों में बेटियों को भी श्राद्ध का अधिकारी बताया गया है।
- आचार्य शिव प्रसाद ममगाई, जाने माने शास्त्रज्ञ व कथावाचक
Courtesy: अमर उजाला




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