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अल्मोड़ा : 07 अक्टूबर , 2015
फेसबुक के सीईओ जुकरबर्ग अमेरिका ही अकेली हस्ती नहीं हैं जिन्हें कैंची धाम के संत नीम करौली बाबा से प्रेरणा मिली हो, उनसे पहले अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रह चुके जाने-माने मनोचिकित्सक प्रो. एलपर्ट रामदास 1967 में भारत आए और नीम करौली बाबा के शिष्य बन गए।

नीम करौली बाबा से मिलने के बाद उनकी जिंदगी ही बदल गई और बाबा जी ने उन्हें रामदास नाम दिया। इस अंग्रेज विद्वान ने हिंदू धर्म अपनाया और अमेरिका में अनेक संस्थाओं के जरिए लोगों की सेवा में लग गए। उन्होंने 15 किताबें लिखी हैं इनमें कई पुस्तकें काफी चर्चित रही हैं। इसमें एक किताब नीम करौली बाबा के बारे में भी है। उन्होंने न्यूयार्क में नीम करौली बाबा का मंदिर भी बनवाया है।

डॉ. रिचर्ड एलपर्ट का जन्म 1931 में हुआ। अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद वह कैलिफोर्निया और वर्कले विवि में विजिटिंग प्रोफेसर रहे। फिर हार्वर्ड विवि में स्थायी रूप से मनोविज्ञान के प्रोफेसर बन गए। 1963 में उन्होंने हार्वर्ड विवि से इस्तीफा दे दिया।

अपनी मां के निधन के बाद वह काफी दुखी और बेचैन हो गए थे और शांति पाने के उद्देश्य से 1967 में वह भारत आए। अपने एक मित्र की सलाह पर वह नीम करौली बाबा से मिले। एलपर्ट ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि नीम करौली बाबा ने मां के निधन की सारी कहानी उन्हें बता दी।

इस पर प्रो. एलपर्ट बाबा जी के गले लगकर खूब रोये और उन्हें ऐसा लगा मानो वह अपने घर पहुंच गए हों। प्रो. एलपर्ट ने बाबा जी को अपना गुरु बना लिया। नीम करौली बाबा ने प्रो. एलपर्ट को राम दास नाम दिया और दीक्षा भी दी। उन्होंने हिंदू धर्म अपनाने के साथ ही हिंदू धर्म के बारे में काफी अध्ययन किया।
Courtesy: अमर उजाला


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