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गढ़वाल का इतिहास बस पलटने भर की देरी है कि आपको उसमें मिटटी के नीचे दफन कई रहस्य उजागर हो जायेंगे. मैं गढ़ नरेश के दरवारी कवि मौला राम तोमर की कविताओं का एक संग्रह उस काल में पढ़ रहा था जिस काल में उस समय के बच्चे अपनी नाक भी साफ़ नहीं कर पाते थे व हम सबकी कमीज की बाजू पर पपड़ी जमी रहती थी जिसमें अक्सर मक्खियाँ भिनभिनाया करती थी. 
बेशक शिक्षित समाज ने गॉव तक शिक्षा के साथ सफ़ाई को भी भेजा है अब वह समय चला गया जब गॉव के रास्ते दोपाय मल से सने रहते थे व दूर से ही उसकी बदबू नथूनों को दूषित करने लगती थी. 
उस काल की बात अब गुजर गई लेकिन इतिहास के पन्ने हमेशा आखरों से पटे रहते हैं. तब मैं शायद पांचवीं कक्षा का विद्यार्थी था और ऊँचे ऊँचे स्वर में पढ़ रहा था मौला राम तौमर की इन पंक्तियों को- 
सवा लाख संग फ़ौज सलाणी, 
लोधी और बघाली आये, 
तडा-तोम्डा संग महि लाये,
बाकी सब गढ़ के संग लागे,
खसिया बामन चले जो आगे...! 
तब रिन्गवाडस्यूं बमोली में मेरे मामा जी जोकि काफी विद्वान थे मुझसे बोले - ये कविता उस दौर में मौला राम तोमर ने लिखी थी जब इगास के समय रिंगवाडा थोकदारों को कुमाऊ के चंदवंशी राजाओं की सेना से मर्चुलासराई खेत में हार का सामना करना पड़ा था यह हार ऐन इगास के रोज हुई थी. जिसके फलस्वरूप रिंगवाड़स्यूं ने इगास नहीं मनाई. बाद में भले ही अन्य जातियां इगास बग्वाल दोनों ही मनाने लगी थी लेकिन रिंगवाड़ा रावतों ने कई बर्षों तक इगास नहीं मनाई. जबकि इस हार का बदला सवा लाख गढ़वाली फ़ौज ने एक माह के अन्दर ले लिया था और बग्वाल पूरे जश्न से मनाई थी. जिसका नेतृत्व भंदो असवाल, भूप गोर्ला, तीरू रिंगवाडा व हंसा हिन्दवान ने किया था. 
आज उत्तराखंड निर्माण के बाद गढ़वाल कुमाऊ जितना निकट आया है उसने भाई चारे की एक बड़ी मिशाल कायम की है. मैं कुमाऊ जहाँ भी गया खूब स्नेह व प्यार मिला कुमाऊ के जन गढ़वाल में भी वही स्नेह और प्यार पाते हैं. यह पोस्ट मैंने इसलिए लिखी ताकि हम इतिहास कीगर्त में छुपे उन पन्नों को ताजा कर सकें जिनका अध्ययन या शोध हमारी भावी पीढ़ी करेगी या कर रही है. मुझे गर्व है कि मैंने बचपन से ही अपने को जिज्ञासु रखा और ऐसे कई सन्दर्भों को अपने स्मृति-पटल पर संजोकर रखा.Manoj Istwal



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