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देहरादून : 16 नवंबर  , 2015

आज अपनी मेहनत और डाउन टू अर्थ रहकर लोकप्रिय लोकगायक प्रीतम भरतवाण जिन्हें जागर सम्राट भी कहा जाता है लोकप्रियता की उस बुलंदी पर हैं जहाँ से नीचे झांककर आम आदमी देखना भी पसंद नहीं करता. प्रीतमभरतवाणजी से जब भी ढोल की बात होती है उनका हाथ कान तक पहुँच जाता है आँखें मूंदने लगती हैं और कंधे स्वत: झुक जाया करते हैं. यह प्रमाण है उस साधना का जिसने उन्हें इतनी उंचाईयां दी. यह कर्म है उस इंसान के जिसने अन्धकार से ओंकार और ओंकार से उन्द्कार की संरचना करने वाले आप रुपी ढोल के उस ढोलसागर की हर ताल को अपने गजाबल और अंगूठे अँगुलियों से सहलाया जिसने ब्रह्माण्ड की रचना की. 
प्रीतम ने उन निकज्जू और अपने पेशे से मुंह मोड़ने वाले व्यक्तियों को भी अपनी मृदु मुस्कानों और कंठकों से निकले बोलों से मधुर स्वरों में कड़ा सन्देश दिया है कि सोने को कोयले के बीच चाहे कितने साल भी रख दो वह खरा ही निकलेगा. आज उनके इसी ढोल व जागर शैली के गायन ने उनके कन्धों का बोझ उतना ही भारी भरकम कर दिया है जितना ढोल होता है जिसमें तामासार की पत्तियाँ, डोरिकाओं का अभिमन्त्र और नागफनों की फनकार चढ़ी होती है. ठीक वैसे ही तमगे उनके कन्धों से लेकर सीने तक उनकी साधना के गीत गाते दिखाई देते हैं.
यह वह कलाकार है जब अपने गॉव जाता है तो बडप्पन नहीं बल्कि अपने भूमिया देवता के गुणगान के लिए काँधे में ढोल डालकर आज भी नौबत्त बजाता है और देवगण ही नहीं सभी मनुष्य भी इस व्यक्ति की इस विधा पर कायल हो नतमस्तक हो जाते हैं.
कनाड़ा यानी सात-समुदर पार के प्रवासियों ने जाने कितने साल से यह योजना बनाई थी कि गढ़-कौथीग का आयोजन हो. और जब वह दिन आया तो सम्मान पाने के लिए प्रीतम भारतवाण जैसा साधक चुनने में उन्हें जरा भी समय नहीं लगा. प्रीतम बताते हैं कि 31 अक्टूबर व 1 नवम्बर को वहां प्रोग्राम है जिसमें वे निश्चित तौर पर ढोल के बोलों से पश्चिम की धरती को गुंजायमान करेंगे. Manoj Istwal


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