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पलायन एक चिंतन....! पर चिंतामग्न हम सभी के लिए यह शुभसंदेश है कि पौड़ी के नागरिकों ने ही नहीं बल्कि हर पहाड़ प्रेमी शुभचिंतकों द्वारा एक पहल का न सिर्फ स्वागत किया बल्कि यह विषय पिछले दो दिनों से राजधानी में चाय की प्यालियों के साथ सुगबुगाहट का भी रहा. इस पहल का साकारात्मक सन्देश यह है कि पौड़ी से पलायन कर देहरादून आ बसे कई व्यवस्थित वर्ग के लोग आज इसे मन से अपनी भूल मानने को तैयार हैं लेकिन तर्क वही है कि पलायन वक्त की मांग थी जिसलिए राज्य आन्दोलन हुआ था उसके साकारात्मक परिणाम न निकलने का ही प्रतिफल है कि "पलायन एक चिंतन" जैसी कार्यशाला पौड़ी में आयोजित की गयी.
इस टीम ने बेशक इसमें कुछ राजनीतिज्ञ हस्तियों को आमंत्रित किया था लेकिन उन्होंने भी इस चिंता में मंथन की ही भागीदारी निभाई न कि किसी तरह का इसे राजनीतिक रंग दिया गया. यह सचमुच शुभसन्देश है कि वहां दलीय राजनीति से हटकर उस दर्द पर चर्चा हुई जो हर एक के सीने में है, व जिसके घाव की पीड़ा हम सबको सालती रहती है. इस टीम ने फिर से निष्प्राण हुए पहाड़ में उम्मीद की किरण जागृत की है.
कहाँ किसने सहयोग किया किसने नहीं किया यह बात उस सबसे ऊपर है कि एक ऐसा गणेश जरुर थर्पा गया है जिसका श्रीगणेश आज हो या कल होना जरुर है. पलायन के दर्द ने पहाड़ की बाट जोह रही उन आँखों को जरुर शुकून दिया है जो अपनों के लौटने की पीड झेलती बुढ़िया गयी लग रही थी.
यहाँ एक काम जरुर हुआ है..और वह है फूंक झोपड़ी तमाशा देख...! इस टीम ने किस तरह इस कार्यक्रम को मैनेज किया यह कहना बड़ा कठिन है लेकिन इस दुस्साहस की दाद देनी होगी जिसे चंद दिनों की बैठक में ही क्रियान्वित किया गया.
पौड़ी में सरदार तो बहुत देखे लेकिन ऐसा सरदार जिसे ठाकुर रतन सिंह असवाल कहते हैं बहुत लोगों ने देखा होगा जिसकी टीम ने वह कर दिखा दिया जिसकी कसमसाहट हर एक के सीने में थी.
लगभग साढ़े बारह घंटे लगातार चिंतन और मंथन ने यह तो तय कर ही दिया है कि जो भी पहाड़ के हक की बात करेगा हर उठने वाला कदम उसके पग चिह्नों पर चलकर उन्हें चिन्हित करेगा. Manoj Istwal


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