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2001 में जब टिहरी डूबने वाला था तो मैंने गढ़वाल के समस्त डिग्री कालेज के छात्र संघ के पदाधिकारियों को साथ लेकर पुरानी टेहरी के 35 ऐतिहासिक स्थानों की मिटटी थैलों में भरकर बादशाही थोल महाविद्यालय ले गए थे वहां परिसर में 35 गढ़े खोद कर उन थैलों की मिटटी उन गढ़ो में प्रर्तिस्थापित कर उन में एक एक पेड़ लगा दिया था। उन गढ़ो के सामने उस एतिहासिक स्थान का बोर्ड भी लगा दिया था। 

आज वे पेड़ काफी बड़े हो गए हैं। उनकी जड़ो में टेहरी की यादगार मिटटी विरासत के रूप में आज भी संजो कर रखी है कौन कहता है की टिहरी डूब गया? टिहरी को हमने बचा के रखा है। हम उत्तराखंडी है अपनी संस्कृति माटी परंपरा को बचाना जानते हैं। टेहरी के 200 जनम वार पर शुभकामनाएं । आभार : कल्याण सिंह रावत 


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