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उत्तराखंड संस्कृति : 23 दिसंबर  , 2015
ऑस्ट्रिया की केटी ने आज तक घुघुती शायद ही देखी हो। भारत आने से पहले गढ़वाल और गढ़वाली के बारे में शायद ही सुना हो..लेकिन पिछले चार महीनों में वह पूरी तरह गढ़वाल और गढ़वाली के रंगों में रंग चुकी है। 

वह अपनी मातृभाषा जर्मन की तरह बिना रुके हिंदी और गढ़वाली बोल सकती है। बीती रात जब उसने घुघुती घुरौण लगी म्यरा मैत की..गाया तो किसी को विश्वास नही हुआ कि वह सात समंदर पार के एक मुल्क से आई है। केटी ने उस गीत के जरिये आधुनिकता की आड़ में अपनी बोली–भाषा से दूर हो रहे लोगों को सन्देश भी दिया कि लोक भाषा में जो प्रेम, अपनत्व और मिठास है..वो कहीं और नही.. आभार: अनिल चंदोला 


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