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होली का दिन था मैं 8 साल बाद गांव में होली खेलने पंहुचा, सुबह-सुबह उठ के रंग ले के बाहर निकला तो मन में एक सवाल आया कि कहाँ जाऊं किसके साथ होली खेलूँ मेरे साथ का तो कोई है नहीं गांव में जो पहले की तरह सारे गांव में रंग डाले। निराश हो कर वापस घर के अंदर चल दिया और चारपाई पर लेटे-लेटे वो दिन याद करने लगा जब हम घर घर जाके होली खेलते थे रंग डालते थे, ना जाने कैसी-कैसी सरारतें करते थे पर आज सूरज निकलने को है और अब तक सारा गांव शांत था। आँखें नम थी और चेहरा उदाश तभी माँ आई और पूछा क्या हुआ तो मैंने दिल की बात बता दी की मन उदाश है आज गांव में त्यौहार भी त्यौहार नहीं लगते है। सब अपने आप में इतने बयस्त है की सारे रीति रिवाज भूल गये। एक समय था जब सारा गांव भरा रहता था ना किसी का डर ना भय, मिल जुल कर काम करते थे अब भले ही वो किसी की शादी हो या किसी के घर का छत डालना हो। आज एसो आराम शान सौकत के चलते लोग गांवों को छोड़ कर शहरों में पलायन करने लगें हैं। तितर बितर होने लगे है, जहाँ हर दूसरे तीसरे साल मेले होते थे आज देवी देवताओं की उन मूर्तियों पर उन हथियारों पर भी धुल लगी हुई है, आज फसल से लहराते खेतों में सूखी घास जमी हुई है, रास्ते खिले फूल भी लगे लगे सूख जाते हैं, बसंत भी अपनी खुसबू यूं ही गवां देती है और पेड़ों पर लगे फल पछियाँ खा जाती हैं।

इतना कहते ही आँखों से आँशु टपक पड़े और माँ ने गले लगा लिया, जेसे तैसे खुद को संभाला और उठ के गांव की और चल पड़ा। ऐक मिला दूसरा मिला और चंद पल में ही गांव के सारे लोगों से मिल लिया फिर वही ख़यालात मन में बस इतने से लोग रहे है अब मेरे गांव में जहां कभी सेकड़ो लोग रहते थे आज गिनती के 20-25 ही हैं, इस मन को समझाना मुश्किल था घर लोटा होली का दिन भी बीता दो दिन बात मुझे भी दूर शहर आना था। आखिर वो दिन भी आया और आते आते पीछे मुड़ के गांव की और देखा तो आँखे नम थी पर आना मेरी मजबूरी थी भला इतना सुन्दर पहाड़, इतने प्यारे भोले लोगों को छोड़ कर कौन आना चाहेगा और यही सायद सबकी मजबूरी भी थी की जो आज गांव मैं गिनती के लोग रहें हैं जो हमारी संस्कृति को संवारे हुऐ हैं| आभार : लक्ष्मी प्रसाद लकी


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